अहो कष्ट्ऽं बाल्यादहमिह सखीं दुष्टहृदया
मुहुर्मानग्रन्थिं सहजसरलां ग्राहितवती ।
तदारम्भाद्गोपीगणरतिगुरो निर्भरमसौ
न लेभे लुब्धापि त्वदमलभुजस्तम्भरभसम् ॥
अहो कष्ट्ऽं बाल्यादहमिह सखीं दुष्टहृदया
मुहुर्मानग्रन्थिं सहजसरलां ग्राहितवती ।
तदारम्भाद्गोपीगणरतिगुरो निर्भरमसौ
न लेभे लुब्धापि त्वदमलभुजस्तम्भरभसम् ॥
मुहुर्मानग्रन्थिं सहजसरलां ग्राहितवती ।
तदारम्भाद्गोपीगणरतिगुरो निर्भरमसौ
न लेभे लुब्धापि त्वदमलभुजस्तम्भरभसम् ॥
अन्वयः
AI
अहो कष्टम्! अहम् बाल्यात् इह सहज-सरलाम् सखीम् मुहुः मान-ग्रन्थिम् दुष्ट-हृदया ग्राहितवती। गोपी-गण-रति-गुरुः! तद्-आरम्भात् असौ लुब्धा अपि तव अमल-भुज-स्तम्भ-रभसम् निर्भरम् न लेभे।
Summary
AI
Oh, what a pity! Out of a wicked heart, I have since childhood repeatedly made my naturally simple friend hold onto knots of pride. O teacher of delight for the Gopīs! Because of that pride, she did not fully obtain the joy of your pure, pillar-like arms, even though she longed for it.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | हो | क | ष्ट्ऽं | बा | ल्या | द | ह | मि | ह | स | खीं | दु | ष्ट | हृ | द | या |
| मु | हु | र्मा | न | ग्र | न्थिं | स | ह | ज | स | र | लां | ग्रा | हि | त | व | ती |
| त | दा | र | म्भा | द्गो | पी | ग | ण | र | ति | गु | रो | नि | र्भ | र | म | सौ |
| न | ले | भे | लु | ब्धा | पि | त्व | द | म | ल | भु | ज | स्त | म्भ | र | भ | सम् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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