कदाचिद्वासन्तीकुहरभुवि धृष्टः सरभसं
हसन् पृष्ठालम्बी स्थगयति कराभ्यां मम दृशौ ।
दिधीर्षौ जातेर्ष्यं मयि सखि तदीयाङ्गुलिशिखां
न जाने कुत्रायं व्रजति कितवानां किल गुरुः ॥
कदाचिद्वासन्तीकुहरभुवि धृष्टः सरभसं
हसन् पृष्ठालम्बी स्थगयति कराभ्यां मम दृशौ ।
दिधीर्षौ जातेर्ष्यं मयि सखि तदीयाङ्गुलिशिखां
न जाने कुत्रायं व्रजति कितवानां किल गुरुः ॥
हसन् पृष्ठालम्बी स्थगयति कराभ्यां मम दृशौ ।
दिधीर्षौ जातेर्ष्यं मयि सखि तदीयाङ्गुलिशिखां
न जाने कुत्रायं व्रजति कितवानां किल गुरुः ॥
अन्वयः
AI
सखि! कदाचित् वासन्ती-कुहर-भुवि धृष्टः सरभसम् हसन् पृष्ठ-आलम्बी कराभ्याम् मम दृशौ स्थगयति। मयि जात-ईर्ष्यम् तदीय-अङ्गुलि-शिखाम् दिधीर्षौ, कितवानाम् गुरुः अयम् कुत्र व्रजति किल न जाने।
Summary
AI
O friend, sometimes that bold one, laughing impetuously, leans from behind and covers my eyes with his hands in a bower of jasmine. When I, filled with mock indignation, try to catch his fingertips, I know not where this teacher of rogues suddenly vanishes.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क | दा | चि | द्वा | स | न्ती | कु | ह | र | भु | वि | धृ | ष्टः | स | र | भ | सं |
| ह | स | न्पृ | ष्ठा | ल | म्बी | स्थ | ग | य | ति | क | रा | भ्यां | म | म | दृ | शौ |
| दि | धी | र्षौ | जा | ते | र्ष्यं | म | यि | स | खि | त | दी | या | ङ्गु | लि | शि | खां |
| न | जा | ने | कु | त्रा | यं | व्र | ज | ति | कि | त | वा | नां | कि | ल | गु | रुः |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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