ततोऽहं धम्मिल्ले स्थगितमुरलीका सखि शनै-
रलीकामर्षेण भ्रमदविरलभ्रूरुदचलम् ।
कचाकृष्टिक्रीडाक्रमपरिचिते चौर्यचरिते
हरिर्लब्धोपाधिः प्रसभमनयन् मां गिरिदरीम् ॥
ततोऽहं धम्मिल्ले स्थगितमुरलीका सखि शनै-
रलीकामर्षेण भ्रमदविरलभ्रूरुदचलम् ।
कचाकृष्टिक्रीडाक्रमपरिचिते चौर्यचरिते
हरिर्लब्धोपाधिः प्रसभमनयन् मां गिरिदरीम् ॥
रलीकामर्षेण भ्रमदविरलभ्रूरुदचलम् ।
कचाकृष्टिक्रीडाक्रमपरिचिते चौर्यचरिते
हरिर्लब्धोपाधिः प्रसभमनयन् मां गिरिदरीम् ॥
अन्वयः
AI
सखि! ततः अहम् धम्मिल्ले स्थगित-मुरलीका अलीक-अमर्षण भ्रमत्-अविरल-भ्रूः उदचलम्। कच-आकृष्टि-क्रीडा-क्रम-परिचिते चौर्य-चरिते लब्ध-उपाधिः हरिः प्रसभम् माम् गिरिदरीम् अनयत्।
Summary
AI
O friend, then I moved away, having hidden his flute in my hair-braid, my eyebrows knitting in feigned anger. But Hari, having found a pretext in the act of theft—being well-versed in the sport of pulling hair—forcibly led me into a mountain cave.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | तो | ऽहं | ध | म्मि | ल्ले | स्थ | गि | त | मु | र | ली | का | स | खि | श | नै |
| र | ली | का | म | र्षे | ण | भ्र | म | द | वि | र | ल | भ्रू | रु | द | च | लम् |
| क | चा | कृ | ष्टि | क्री | डा | क्र | म | प | रि | चि | ते | चौ | र्य | च | रि | ते |
| ह | रि | र्ल | ब्धो | पा | धिः | प्र | स | भ | म | न | य | न्मां | गि | रि | द | रीम् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.