अशक्तां गन्तव्ये कलितनवचेलाञ्चलतया
लतालीभिः पुष्पस्मितशवलिताभिर्विरुदतीम् ।
परीहासारम्भी प्रियसखि स मां लम्बितमुखीं
प्रपेदे चुम्बाय स्फुरदधरबिम्बस्तव सखा ॥
अशक्तां गन्तव्ये कलितनवचेलाञ्चलतया
लतालीभिः पुष्पस्मितशवलिताभिर्विरुदतीम् ।
परीहासारम्भी प्रियसखि स मां लम्बितमुखीं
प्रपेदे चुम्बाय स्फुरदधरबिम्बस्तव सखा ॥
लतालीभिः पुष्पस्मितशवलिताभिर्विरुदतीम् ।
परीहासारम्भी प्रियसखि स मां लम्बितमुखीं
प्रपेदे चुम्बाय स्फुरदधरबिम्बस्तव सखा ॥
अन्वयः
AI
हे प्रियसखि! गन्तव्ये अशक्ताम् कलित-नव-चेल-अञ्चलतया पुष्प-स्मित-शवलिताभिः लता-लीभिः विरुदतीम् लम्बित-मुखीम् माम् परीहास-आरम्भी स्फुरत्-अधर-बिम्बः तव सखा चुम्बाय प्रपेदे।
Summary
AI
O dear friend, when I was unable to go because my new garment was caught by the creepers, which seemed to mock me with their blossoming flowers, your friend with throbbing bimba-red lips approached me, who was weeping with head hung low, to begin his playful kiss.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | श | क्तां | ग | न्त | व्ये | क | लि | त | न | व | चे | ला | ञ्च | ल | त | या |
| ल | ता | ली | भिः | पु | ष्प | स्मि | त | श | व | लि | ता | भि | र्वि | रु | द | तीम् |
| प | री | हा | सा | र | म्भी | प्रि | य | स | खि | स | मां | ल | म्बि | त | मु | खीं |
| प्र | पे | दे | चु | म्बा | य | स्फु | र | द | ध | र | बि | म्ब | स्त | व | स | खा |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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