अमर्षाद्धावन्तीं गहनकुहरे सूचितपथां
तुलाकोटिक्वानैश्चकितपदपातद्विगुणितैः ।
विधीर्षन् मां हर्षोत्तरलनयनान्तः स कुतुकी
न वंशीमज्ञासीद्भुवि करसरोजाद्विगलिताम् ॥
अमर्षाद्धावन्तीं गहनकुहरे सूचितपथां
तुलाकोटिक्वानैश्चकितपदपातद्विगुणितैः ।
विधीर्षन् मां हर्षोत्तरलनयनान्तः स कुतुकी
न वंशीमज्ञासीद्भुवि करसरोजाद्विगलिताम् ॥
तुलाकोटिक्वानैश्चकितपदपातद्विगुणितैः ।
विधीर्षन् मां हर्षोत्तरलनयनान्तः स कुतुकी
न वंशीमज्ञासीद्भुवि करसरोजाद्विगलिताम् ॥
अन्वयः
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सः कुतुकी हर्ष-उत्तरल-नयन-अन्तः चकित-पद-पात-द्विगुणितैः तुलाकोटि-क्वानैः सूचित-पथाम् अमर्षात् धावन्तीम् माम् विधीर्षन् कर-सरोजाद् विगलिताम् वंशीम् भुवि न अज्ञासीत्।
Summary
AI
While trying to seize me as I ran away in anger—my path betrayed by the jingling of my anklets, doubled by my startled steps—that playful one, his eyes dancing with joy, did not even realize that the flute had slipped from his lotus-hand onto the ground.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | म | र्षा | द्धा | व | न्तीं | ग | ह | न | कु | ह | रे | सू | चि | त | प | थां |
| तु | ला | को | टि | क्वा | नै | श्च | कि | त | प | द | पा | त | द्वि | गु | णि | तैः |
| वि | धी | र्ष | न्मां | ह | र्षो | त्त | र | ल | न | य | ना | न्तः | स | कु | तु | की |
| न | वं | शी | म | ज्ञा | सी | द्भु | वि | क | र | स | रो | जा | द्वि | ग | लि | ताम् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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