अयि स्वप्नो दूरे विरमतु समक्षं शृणु हठा-
दविश्वस्ता मा भूरिह सखि मनोविभ्रमधिया ।
वयस्यस्ते गोवर्धनविपिनमासाद्य कुतुका-
दकाण्डे यद्भूयः स्मरकलहपाण्डित्यमतनोत् ॥
अयि स्वप्नो दूरे विरमतु समक्षं शृणु हठा-
दविश्वस्ता मा भूरिह सखि मनोविभ्रमधिया ।
वयस्यस्ते गोवर्धनविपिनमासाद्य कुतुका-
दकाण्डे यद्भूयः स्मरकलहपाण्डित्यमतनोत् ॥
दविश्वस्ता मा भूरिह सखि मनोविभ्रमधिया ।
वयस्यस्ते गोवर्धनविपिनमासाद्य कुतुका-
दकाण्डे यद्भूयः स्मरकलहपाण्डित्यमतनोत् ॥
अन्वयः
AI
अयि! स्वप्नः दूरे विरमतु। समक्षम् शृणु। सखि! हठात् इह मनो-विभ्रम-धिया अविश्वस्ता मा भूः। वयस्यः ते गोवर्धन-विपिनम् आसाद्य कुतुकात् अकाण्डे यत् भूयः स्मर-कलह-पाण्डित्यम् अतनोत्।
Summary
AI
O friend, let the dream cease from afar; listen to what is before you! Do not suddenly be distrustful, thinking this is a delusion of the mind. Your friend Kṛṣṇa, having reached the Govardhana forest, has unexpectedly displayed his expertise in the amorous quarrels of love once more.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | यि | स्व | प्नो | दू | रे | वि | र | म | तु | स | म | क्षं | शृ | णु | ह | ठा |
| द | वि | श्व | स्ता | मा | भू | रि | ह | स | खि | म | नो | वि | भ्र | म | धि | या |
| व | य | स्य | स्ते | गो | व | र्ध | न | वि | पि | न | मा | सा | द्य | कु | तु | का |
| द | का | ण्डे | य | द्भू | यः | स्म | र | क | ल | ह | पा | ण्डि | त्य | म | त | नोत् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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