अनौचित्यं तस्य व्यथयति मनो हन्त मथुरां
त्वमासाद्य स्वैरं चपलहृदयं वारय हरिम् ।
सखि स्वप्नारम्भे पुनरपि यथा विभ्रम मदा-
दिहायातो धूर्तः क्षपयति न मे किङ्किनिगुणम् ॥
अनौचित्यं तस्य व्यथयति मनो हन्त मथुरां
त्वमासाद्य स्वैरं चपलहृदयं वारय हरिम् ।
सखि स्वप्नारम्भे पुनरपि यथा विभ्रम मदा-
दिहायातो धूर्तः क्षपयति न मे किङ्किनिगुणम् ॥
त्वमासाद्य स्वैरं चपलहृदयं वारय हरिम् ।
सखि स्वप्नारम्भे पुनरपि यथा विभ्रम मदा-
दिहायातो धूर्तः क्षपयति न मे किङ्किनिगुणम् ॥
अन्वयः
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हन्त! तस्य अनौचित्यम् मनः व्यथयति। त्वम् मथुराम् आसाद्य स्वैरम् चपल-हृदयम् हरिम् वारय। सखि! यथा स्वप्न-आरम्भे पुनः अपि विभ्रम-मदात् इह आयातः धूर्तः मे किङ्किणी-गुणम् न क्षपयति।
Summary
AI
Alas, his impropriety pains my heart! Having reached Mathurā, restrain the fickle-hearted Hari at your will. O friend, ensure that the rogue does not come here again in a dream, intoxicated by delusion, to undo the string of my waist-bells.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | नौ | चि | त्यं | त | स्य | व्य | थ | य | ति | म | नो | ह | न्त | म | थु | रां |
| त्व | मा | सा | द्य | स्वै | रं | च | प | ल | हृ | द | यं | वा | र | य | ह | रिम् |
| स | खि | स्व | प्ना | र | म्भे | पु | न | र | पि | य | था | वि | भ्र | म | म | दा |
| दि | हा | या | तो | धू | र्तः | क्ष | प | य | ति | न | मे | कि | ङ्कि | नि | गु | णम् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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