मनो मे हा कष्टं ज्वलति किमहं हन्त करवै
न पारं नावारं किमपि कलयाम्य् अस्य जलधेः ।
इयं वन्दे मूर्ध्ना सपदि तमुपायं कथय मां
पतामृष्ये यस्माद्धृतिकणिकयापे क्षणिकया ॥
मनो मे हा कष्टं ज्वलति किमहं हन्त करवै
न पारं नावारं किमपि कलयाम्य् अस्य जलधेः ।
इयं वन्दे मूर्ध्ना सपदि तमुपायं कथय मां
पतामृष्ये यस्माद्धृतिकणिकयापे क्षणिकया ॥
न पारं नावारं किमपि कलयाम्य् अस्य जलधेः ।
इयं वन्दे मूर्ध्ना सपदि तमुपायं कथय मां
पतामृष्ये यस्माद्धृतिकणिकयापे क्षणिकया ॥
अन्वयः
AI
हा कष्टम्! मे मनः ज्वलति। हन्त! अहम् किम् करवै? अस्य जलधेः पारम् न अवारम् न किमपि कलयामि। इयम् मूर्ध्ना वन्दे। मां सपदि तम् उपायम् कथय, यस्मात् क्षणिकया अपि धृति-कणिकया अपि ऋष्ये।
Summary
AI
Alas, what misery! My heart is burning. Oh, what should I do? I perceive neither the shore nor the near side of this ocean of grief. I bow my head to you; tell me quickly a means by which I might find even a momentary grain of fortitude.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | नो | मे | हा | क | ष्टं | ज्व | ल | ति | कि | म | हं | ह | न्त | क | र | वै |
| न | पा | रं | ना | वा | रं | कि | म | पि | क | ल | या | म्य | स्य | ज | ल | धेः |
| इ | यं | व | न्दे | मू | र्ध्ना | स | प | दि | त | मु | पा | यं | क | थ | य | मां |
| प | ता | मृ | ष्ये | य | स्मा | द्धृ | ति | क | णि | क | या | पे | क्ष | णि | क | या |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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