राणद्भृङ्गश्रेणीसुहृदि शरदारम्भमधुरे
वनान्ते चान्द्रीभिः किरणलहरीभिर्धवलिते ।
कदा प्रेमोद्दण्डस्मरकलहवैतण्डिकमहं
करिष्ये गोविन्दं निविडभुजबन्धप्रणयिनम् ॥
राणद्भृङ्गश्रेणीसुहृदि शरदारम्भमधुरे
वनान्ते चान्द्रीभिः किरणलहरीभिर्धवलिते ।
कदा प्रेमोद्दण्डस्मरकलहवैतण्डिकमहं
करिष्ये गोविन्दं निविडभुजबन्धप्रणयिनम् ॥
वनान्ते चान्द्रीभिः किरणलहरीभिर्धवलिते ।
कदा प्रेमोद्दण्डस्मरकलहवैतण्डिकमहं
करिष्ये गोविन्दं निविडभुजबन्धप्रणयिनम् ॥
अन्वयः
AI
राणत्-भृङ्ग-श्रेणी-सुहृदि शरत्-आरम्भ-मधुरे चान्द्रीभिः किरण-लहरीभिः धवलिते वनान्ते कदा अहम् प्रेम-उद्दण्ड-स्मर-कलह-वैतण्डिकम् निविड-भुज-बन्ध-प्रणयिनम् गोविन्दम् करिष्ये।
Summary
AI
When shall I make Govinda my lover, bound in a tight embrace, within the forest glade whitened by waves of moonlight and sweet with the beginning of autumn, where humming bees are his friends? He is a skillful debater in the battles of love provoked by intense passion.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रा | ण | द्भृ | ङ्ग | श्रे | णी | सु | हृ | दि | श | र | दा | र | म्भ | म | धु | रे |
| व | ना | न्ते | चा | न्द्री | भिः | कि | र | ण | ल | ह | री | भि | र्ध | व | लि | ते |
| क | दा | प्रे | मो | द्द | ण्ड | स्म | र | क | ल | ह | वै | त | ण्डि | क | म | हं |
| क | रि | ष्ये | गो | वि | न्दं | नि | वि | ड | भु | ज | ब | न्ध | प्र | ण | यि | नम् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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