ययौ कालः कल्याण्य् अधिकलितकेली परिमलां
विलासार्थी यस्मिन्न् अचलकुहरे लीनवपुषम् ।
स मां धृत्वा धूर्तः कृतकपटरोषां सखि हठा-
दकार्षीदाकर्षन्न् उरसि शशिलेखाशतवृताम् ॥
ययौ कालः कल्याण्य् अधिकलितकेली परिमलां
विलासार्थी यस्मिन्न् अचलकुहरे लीनवपुषम् ।
स मां धृत्वा धूर्तः कृतकपटरोषां सखि हठा-
दकार्षीदाकर्षन्न् उरसि शशिलेखाशतवृताम् ॥
विलासार्थी यस्मिन्न् अचलकुहरे लीनवपुषम् ।
स मां धृत्वा धूर्तः कृतकपटरोषां सखि हठा-
दकार्षीदाकर्षन्न् उरसि शशिलेखाशतवृताम् ॥
अन्वयः
AI
हे कल्याणि! विलास-अर्थी धूर्तः सः यस्मिन् अचल-कुहरे लीन-वपुषम् कृत-कपट-रोषाम् माम् हठात् धृत्वा उरसि शशि-लेखा-शत-वृताम् आकर्षन् अधिकलित-केली-परिमलाम् अकार्षीत्, कालः ययौ।
Summary
AI
O auspicious one! Time has passed since that rogue, seeking amorous sport, forcibly seized me in a mountain cave where I was hiding my body and feigning anger. He drew me to his chest, which was adorned with a hundred crescent moons, and filled me with the fragrance of his intimate play.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | यौ | का | लः | क | ल्या | ण्य | धि | क | लि | त | के | ली | प | रि | म | लां |
| वि | ला | सा | र्थी | य | स्मि | न्न | च | ल | कु | ह | रे | ली | न | व | पु | षम् |
| स | मां | धृ | त्वा | धू | र्तः | कृ | त | क | प | ट | रो | षां | स | खि | ह | ठा |
| द | का | र्षी | दा | क | र्ष | न्नु | र | सि | श | शि | ले | खा | श | त | वृ | ताम् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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