कदा प्रेमोन्मीलन्मदनमदिराक्षी समुदयात्
बलादाकर्षन्तं मधुरमुरलीकाकलिकया ।
मुहुर्भ्राम्यच्चिल्लीचुलुकितकुलस्त्रीव्रतमहं
विलोकेयं लीलामदमिलदपाङ्गी मुरभिदम् ॥
कदा प्रेमोन्मीलन्मदनमदिराक्षी समुदयात्
बलादाकर्षन्तं मधुरमुरलीकाकलिकया ।
मुहुर्भ्राम्यच्चिल्लीचुलुकितकुलस्त्रीव्रतमहं
विलोकेयं लीलामदमिलदपाङ्गी मुरभिदम् ॥
बलादाकर्षन्तं मधुरमुरलीकाकलिकया ।
मुहुर्भ्राम्यच्चिल्लीचुलुकितकुलस्त्रीव्रतमहं
विलोकेयं लीलामदमिलदपाङ्गी मुरभिदम् ॥
अन्वयः
AI
कदा प्रेम-उन्मीलत्-मदन-मदिराक्षीः बलात् मधुर-मुरली-काकलिकया आकर्षन्तम् मुहुः भ्राम्यत्-चिल्ली-चुलुकित-कुलस्त्री-व्रतम् लीला-मद-मिलत्-अपाङ्गी मुरभिदम् अहम् विलोकेयं।
Summary
AI
When shall I behold Murabhid (Kṛṣṇa), whose side-glances are intoxicated with playful joy, as he forcibly attracts the women whose eyes are like wine with the passion of awakening love through the sweet warbling of his flute, and who, with the constant movement of his eyebrows, has swallowed the vows of virtuous wives?
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क | दा | प्रे | मो | न्मी | ल | न्म | द | न | म | दि | रा | क्षी | स | मु | द | या |
| त्ब | ला | दा | क | र्ष | न्तं | म | धु | र | मु | र | ली | का | क | लि | क | या |
| मु | हु | र्भ्रा | म्य | च्चि | ल्ली | चु | लु | कि | त | कु | ल | स्त्री | व्र | त | म | हं |
| वि | लो | के | यं | ली | ला | म | द | मि | ल | द | पा | ङ्गी | मु | र | भि | दम् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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