अमी कुञ्जः पूर्वं न मम दधिरे कामपि मुदं
द्रुमालीयं चेतः सखि न कतिशो नन्दितवती ।
इदानीं पश्यैते युगपदपतापं विदधते
प्रभो मुक्तोपेक्षे भजति न हि को वा विमुखताम् ॥
अमी कुञ्जः पूर्वं न मम दधिरे कामपि मुदं
द्रुमालीयं चेतः सखि न कतिशो नन्दितवती ।
इदानीं पश्यैते युगपदपतापं विदधते
प्रभो मुक्तोपेक्षे भजति न हि को वा विमुखताम् ॥
द्रुमालीयं चेतः सखि न कतिशो नन्दितवती ।
इदानीं पश्यैते युगपदपतापं विदधते
प्रभो मुक्तोपेक्षे भजति न हि को वा विमुखताम् ॥
अन्वयः
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सखि, पूर्वम् अमी कुञ्जः मम काम् अपि मुदम् न दधिरे इति न, इयम् द्रुम-आली चेतः कतिशः न नन्दितवती इति न। पश्य, इदानीम् एते युगपत अपतापम् विदधते। हे प्रभो, मुक्त-उपेक्षे त्वयि सति कः वा विमुखताम् न हि भजति?॥
Summary
AI
O friend, it is not that these bowers did not previously bring me joy, nor that this row of trees did not delight my heart many times. See, now they all simultaneously cause me distress. O Lord, when you have cast off your concern, who or what does not turn against me?
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | मी | कु | ञ्जः | पू | र्वं | न | म | म | द | धि | रे | का | म | पि | मु | दं |
| द्रु | मा | ली | यं | चे | तः | स | खि | न | क | ति | शो | न | न्दि | त | व | ती |
| इ | दा | नीं | प | श्यै | ते | यु | ग | प | द | प | ता | पं | वि | द | ध | ते |
| प्र | भो | मु | क्तो | पे | क्षे | भ | ज | ति | न | हि | को | वा | वि | मु | ख | ताम् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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