दृष्टिघ्राणविषान्फणाधरपतीनष्टापि दृष्ट्या स्वयं
रोद्धुं द्रावयितुं विनाशयितुमप्यव्याहतप्रक्रमः ।
मार्जारान्नकुलांश्च किं खगपतिः साह्ये वृणोत्यात्मनः
किं प्रत्यर्थिकुलस्य वृत्तिद इति प्रद्वेष्टि वा मारुतम् ॥
दृष्टिघ्राणविषान्फणाधरपतीनष्टापि दृष्ट्या स्वयं
रोद्धुं द्रावयितुं विनाशयितुमप्यव्याहतप्रक्रमः ।
मार्जारान्नकुलांश्च किं खगपतिः साह्ये वृणोत्यात्मनः
किं प्रत्यर्थिकुलस्य वृत्तिद इति प्रद्वेष्टि वा मारुतम् ॥
रोद्धुं द्रावयितुं विनाशयितुमप्यव्याहतप्रक्रमः ।
मार्जारान्नकुलांश्च किं खगपतिः साह्ये वृणोत्यात्मनः
किं प्रत्यर्थिकुलस्य वृत्तिद इति प्रद्वेष्टि वा मारुतम् ॥
अन्वयः
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खगपतिः स्वयम् अव्याहत-प्रक्रमः (सन्) दृष्टि-घ्राण-विषान् अष्टौ फणाधर-पतीन् अपि दृष्ट्या रोद्धुम्, द्रावयितुम्, विनाशयितुम् अपि (शक्तः)। (सः) आत्मनः साह्ये मार्जारान् नकुलान् च किम् वृणोति? प्रत्यर्थि-कुलस्य वृत्तिदः इति मारुतम् किम् प्रद्वेष्टि वा?
Summary
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The lord of birds (Garuda), whose power is unobstructed, is himself capable of stopping, driving away, and even destroying all eight serpent kings—who are poisonous by sight and smell—with a mere glance. Why would he choose cats and mongooses for his aid? And why would he hate the wind, thinking it gives sustenance to the enemy's clan (snakes, who live on air)?
पदच्छेदः
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| दृष्टिघ्राणविषान् | दृष्टि–घ्राण–विष (२.३) | who are poisonous by sight and smell |
| फणाधरपतीन् | फणाधर–पति (२.३) | serpent kings |
| अष्टौ | अष्टन् (२.३) | eight |
| अपि | अपि | even |
| दृष्ट्या | दृष्टि (३.१) | by a glance |
| स्वयम् | स्वयम् | himself |
| रोद्धुम् | रोद्धुम् (√रुध्+तुमुन्) | to stop |
| द्रावयितुम् | द्रावयितुम् (√द्रु+णिच्+तुमुन्) | to drive away |
| विनाशयितुम् | विनाशयितुम् (वि√नश्+णिच्+तुमुन्) | to destroy |
| अपि | अपि | even |
| अव्याहतप्रक्रमः | अव्याहत (न+वि+आ√हन्+क्त)–प्रक्रम (१.१) | whose power is unobstructed |
| मार्जारान् | मार्जार (२.३) | cats |
| नकुलान् | नकुल (२.३) | mongooses |
| च | च | and |
| किम् | किम् | why |
| खगपतिः | खगपति (१.१) | the lord of birds (Garuda) |
| साह्ये | साह्य (७.१) | for aid |
| वृणोति | वृणोति (√वृ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | chooses |
| आत्मनः | आत्मन् (६.१) | his own |
| किम् | किम् | why |
| प्रत्यर्थिकुलस्य | प्रत्यर्थिन्–कुल (६.१) | of the enemy's clan |
| वृत्तिदः | वृत्ति–द (१.१) | sustenance-giver |
| इति | इति | thus |
| प्रद्वेष्टि | प्रद्वेष्टि (प्र√द्विष् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | hates |
| वा | वा | or |
| मारुतम् | मारुत (२.१) | the wind |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| दृ | ष्टि | घ्रा | ण | वि | षा | न्फ | णा | ध | र | प | ती | न | ष्टा | पि | दृ | ष्ट्या | स्व | यं |
| रो | द्धुं | द्रा | व | यि | तुं | वि | ना | श | यि | तु | म | प्य | व्या | ह | त | प्र | क्र | मः |
| मा | र्जा | रा | न्न | कु | लां | श्च | किं | ख | ग | प | तिः | सा | ह्ये | वृ | णो | त्या | त्म | नः |
| किं | प्र | त्य | र्थि | कु | ल | स्य | वृ | त्ति | द | इ | ति | प्र | द्वे | ष्टि | वा | मा | रु | तम् |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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