हन्यन्ते कति जन्तवो वनचरैर्नित्यं कति श्वापदै-
र्गृह्यन्ते कति कूटयन्वरचनैः क्षोणीभृतां प्रीतयेम् ।
एतावत्यपि विप्लवे न भजसे कस्यापि दृग्गोचरं
स्वच्छन्दश्च सृगाल खेलसि पुनस्तुल्यं वनग्रामयोः ॥
हन्यन्ते कति जन्तवो वनचरैर्नित्यं कति श्वापदै-
र्गृह्यन्ते कति कूटयन्वरचनैः क्षोणीभृतां प्रीतयेम् ।
एतावत्यपि विप्लवे न भजसे कस्यापि दृग्गोचरं
स्वच्छन्दश्च सृगाल खेलसि पुनस्तुल्यं वनग्रामयोः ॥
र्गृह्यन्ते कति कूटयन्वरचनैः क्षोणीभृतां प्रीतयेम् ।
एतावत्यपि विप्लवे न भजसे कस्यापि दृग्गोचरं
स्वच्छन्दश्च सृगाल खेलसि पुनस्तुल्यं वनग्रामयोः ॥
अन्वयः
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नित्यम् कति जन्तवः वनचरैः हन्यन्ते? कति श्वापदैः गृह्यन्ते? कति क्षोणीभृताम् प्रीतये कूट-यन्त्र-रचनैः (गृह्यन्ते)? (हे) सृगाल, एतावति विप्लवे अपि कस्य अपि दृक्-गोचरम् न भजसे, पुनः स्वच्छन्दः (सन्) वन-ग्रामयोः तुल्यम् खेलसि च।
Summary
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How many creatures are killed daily by forest-dwellers? How many are caught by beasts of prey? How many by the construction of traps and snares for the pleasure of kings? O jackal, even in such great turmoil, you do not come into anyone's sight, and you play freely and equally in both the forest and the village.
पदच्छेदः
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| हन्यन्ते | हन्यन्ते (√हन् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | are killed |
| कति | कति (१.३) | how many |
| जन्तवः | जन्तु (१.३) | creatures |
| वनचरैः | वनचर (३.३) | by forest-dwellers |
| नित्यम् | नित्यम् | daily |
| कति | कति (१.३) | how many |
| श्वापदैः | श्वापद (३.३) | by beasts of prey |
| गृह्यन्ते | गृह्यन्ते (√ग्रह् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | are caught |
| कति | कति (१.३) | how many |
| कूटयन्त्ररचनैः | कूट–यन्त्र–रचना (३.३) | by the construction of traps and snares |
| क्षोणीभृताम् | क्षोणीभृत् (६.३) | of kings |
| प्रीतये | प्रीति (४.१) | for the pleasure |
| एतावति | एतावत् (७.१) | in so much |
| अपि | अपि | even |
| विप्लवे | विप्लव (७.१) | turmoil |
| न | न | not |
| भजसे | भजसे (√भज् कर्तरि लट् (आत्मने.) म.पु. एक.) | you come into |
| कस्य | किम् (६.१) | anyone's |
| अपि | अपि | even |
| दृग्गोचरम् | दृश्–गोचर (२.१) | range of sight |
| स्वच्छन्दः | स्वच्छन्द (१.१) | freely |
| च | च | and |
| सृगाल | सृगाल (८.१) | O jackal |
| खेलसि | खेलसि (√खेल् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you play |
| पुनः | पुनः | again |
| तुल्यम् | तुल्यम् | equally |
| वनग्रामयोः | वन–ग्राम (७.२) | in the forest and the village |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ह | न्य | न्ते | क | ति | ज | न्त | वो | व | न | च | रै | र्नि | त्यं | क | ति | श्वा | प | दै |
| र्गृ | ह्य | न्ते | क | ति | कू | ट | य | न्व | र | च | नैः | क्षो | णी | भृ | तां | प्री | त | येम् |
| ए | ता | व | त्य | पि | वि | प्ल | वे | न | भ | ज | से | क | स्या | पि | दृ | ग्गो | च | रं |
| स्व | च्छ | न्द | श्च | सृ | गा | ल | खे | ल | सि | पु | न | स्तु | ल्यं | व | न | ग्रा | म | योः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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