यैर्जीवन्ति सितच्छदा न दुरितं कस्यापि यत्सङ्ग्रहे
रोचन्ते न हि ते मृणालवलयाः कस्मै प्रभूता अमी ।
अप्यासायमुपोष्य मीनपृथुकैर्युक्त्या महत्यार्जितै-
रेकद्वैरपि तृप्तिमेति परमां हिंसोपलब्धैर्बकः ॥
यैर्जीवन्ति सितच्छदा न दुरितं कस्यापि यत्सङ्ग्रहे
रोचन्ते न हि ते मृणालवलयाः कस्मै प्रभूता अमी ।
अप्यासायमुपोष्य मीनपृथुकैर्युक्त्या महत्यार्जितै-
रेकद्वैरपि तृप्तिमेति परमां हिंसोपलब्धैर्बकः ॥
रोचन्ते न हि ते मृणालवलयाः कस्मै प्रभूता अमी ।
अप्यासायमुपोष्य मीनपृथुकैर्युक्त्या महत्यार्जितै-
रेकद्वैरपि तृप्तिमेति परमां हिंसोपलब्धैर्बकः ॥
अन्वयः
AI
यैः सितच्छदाः जीवन्ति, यत्-सङ्ग्रहे कस्य अपि दुरितम् न (भवति), ते अमी प्रभूताः मृणाल-वलयाः कस्मै न रोचन्ते हि? बकः (तु) आसायम् उपोष्य, महत्या युक्त्या आर्जितैः, हिंसा-उपलब्धैः एक-द्वैः मीन-पृथुकैः अपि परमाम् तृप्तिम् एति।
Summary
AI
To whom would these abundant lotus stalks not be pleasing? The white-winged birds (swans) live on them, and in their collection, there is no sin for anyone. In contrast, the crane, after fasting until evening, attains supreme satisfaction with just one or two small fish acquired with great cunning and obtained through violence.
पदच्छेदः
AI
| यैः | यद् (३.३) | by which |
| जीवन्ति | जीवन्ति (√जीव् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | live |
| सितच्छदाः | सित–छद (१.३) | the white-winged ones (swans) |
| न | न | no |
| दुरितम् | दुरित (१.१) | sin |
| कस्य | किम् (६.१) | anyone's |
| अपि | अपि | even |
| यत्सङ्ग्रहे | यद्–सङ्ग्रह (७.१) | in the collection of which |
| रोचन्ते | रोचन्ते (√रुच् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | are pleasing |
| न | न | not |
| हि | हि | indeed |
| ते | तद् (१.३) | those |
| मृणालवलयाः | मृणाल–वलय (१.३) | lotus stalks |
| कस्मै | किम् (४.१) | to whom |
| प्रभूताः | प्रभूत (प्र√भू+क्त, १.३) | abundant |
| अमी | अदस् (१.३) | these |
| अपि | अपि | also |
| आसायम् | आसायम् | until evening |
| उपोष्य | उपोष्य (उप√वस्+ल्यप्) | having fasted |
| मीनपृथुकैः | मीन–पृथुक (३.३) | with small fish |
| युक्त्या | युक्ति (३.१) | with a trick |
| महत्य | महत् (३.१) | great |
| आर्जितैः | आर्जित (√ऋज्+क्त, ३.३) | acquired |
| एकद्वैः | एकद्व (३.३) | with one or two |
| अपि | अपि | even |
| तृप्तिम् | तृप्ति (२.१) | satisfaction |
| एति | एति (√इ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | attains |
| परमाम् | परम (२.१) | supreme |
| हिंसोपलब्धैः | हिंसा–उपलब्ध (उप√लभ्+क्त, ३.३) | obtained through violence |
| बकः | बक (१.१) | the crane |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| यै | र्जी | व | न्ति | सि | त | च्छ | दा | न | दु | रि | तं | क | स्या | पि | य | त्स | ङ्ग्र | हे |
| रो | च | न्ते | न | हि | ते | मृ | णा | ल | व | ल | याः | क | स्मै | प्र | भू | ता | अ | मी |
| अ | प्या | सा | य | मु | पो | ष्य | मी | न | पृ | थु | कै | र्यु | क्त्या | म | ह | त्या | र्जि | तै |
| रे | क | द्वै | र | पि | तृ | प्ति | मे | ति | प | र | मां | हिं | सो | प | ल | ब्धै | र्ब | कः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.