यादोभिर्वडवाग्निना जलनिधेर्यावत्पयो गृह्यते
किं तावत्युपयुज्यते शततमोऽप्यंशः पयोद त्वया ।
सौजन्यं किमिति ब्रवीमि भवतः सर्वस्वमित्थं त्यज-
न्ख्यातः ख्यापयसे पयोधिमपि तं सर्वोपयोगक्षमम् ॥
यादोभिर्वडवाग्निना जलनिधेर्यावत्पयो गृह्यते
किं तावत्युपयुज्यते शततमोऽप्यंशः पयोद त्वया ।
सौजन्यं किमिति ब्रवीमि भवतः सर्वस्वमित्थं त्यज-
न्ख्यातः ख्यापयसे पयोधिमपि तं सर्वोपयोगक्षमम् ॥
किं तावत्युपयुज्यते शततमोऽप्यंशः पयोद त्वया ।
सौजन्यं किमिति ब्रवीमि भवतः सर्वस्वमित्थं त्यज-
न्ख्यातः ख्यापयसे पयोधिमपि तं सर्वोपयोगक्षमम् ॥
अन्वयः
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(हे) पयोद, जलनिधेः यादोभिः वडवाग्निना (च) यावत् पयः गृह्यते, किम् तावति शततमः अंशः अपि त्वया उपयुज्यते? भवतः सौजन्यम् किम् इति ब्रवीमि? इत्थम् सर्वस्वम् त्यजन् (त्वम्) ख्यातः (सन्) तम् पयोधिम् अपि सर्व-उपयोग-क्षमम् ख्यापयसे ।
Summary
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O cloud, of all the water taken from the ocean by sea creatures and the submarine fire, do you even use a hundredth part? What can I say of your generosity? By thus giving away your all, you, being famous, also make that ocean renowned as useful for all.
पदच्छेदः
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| यादोभिः | यादस् (३.३) | by sea creatures |
| वडवाग्निना | वडवाग्नि (३.१) | by the submarine fire |
| जलनिधेः | जलनिधि (६.१) | from the ocean |
| यावत् | यावत् | as much |
| पयः | पयस् (१.१) | water |
| गृह्यते | गृह्यते (√ग्रह् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is taken |
| किं | किम् | is |
| तावति | तावत् (७.१) | of that |
| उपयुज्यते | उपयुज्यते (उप√युज् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is used |
| शततमः | शततम (१.१) | a hundredth |
| अपि | अपि | even |
| अंशः | अंश (१.१) | part |
| पयोद | पयोद (८.१) | O cloud |
| त्वया | युष्मद् (३.१) | by you |
| सौजन्यं | सौजन्य (२.१) | generosity |
| किम् | किम् | what |
| इति | इति | thus |
| ब्रवीमि | ब्रवीमि (√ब्रू कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | can I say |
| भवतः | भवत् (६.१) | your |
| सर्वस्वम् | सर्वस्व (२.१) | your all |
| इत्थं | इत्थम् | thus |
| त्यजन् | त्यजत् (√त्यज्+शत्रृ, १.१) | giving away |
| ख्यातः | ख्यात (√ख्या+क्त, १.१) | being famous |
| ख्यापयसे | ख्यापयसे (√ख्या +णिच् कर्तरि लट् (आत्मने.) म.पु. एक.) | you make renowned |
| पयोधिम् | पयोधि (२.१) | the ocean |
| अपि | अपि | also |
| तं | तद् (२.१) | that |
| सर्वोपयोगक्षमम् | सर्व–उपयोग–क्षम (२.१) | as useful for all |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| या | दो | भि | र्व | ड | वा | ग्नि | ना | ज | ल | नि | धे | र्या | व | त्प | यो | गृ | ह्य | ते |
| किं | ता | व | त्यु | प | यु | ज्य | ते | श | त | त | मो | ऽप्यं | शः | प | यो | द | त्व | या |
| सौ | ज | न्यं | कि | मि | ति | ब्र | वी | मि | भ | व | तः | स | र्व | स्व | मि | त्थं | त्य | ज |
| न्ख्या | तः | ख्या | प | य | से | प | यो | धि | म | पि | तं | स | र्वो | प | यो | ग | क्ष | मम् |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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