गृह्यन्तां करिणः प्रसह्य विनिहन्यन्तां वराहा वृका
भल्लूकाश्च तरक्षवश्च पथिकाः सन्तु त्वया निर्भयाः ।
आखून्कङ्क खराशशाननिमिषान्कीटान्पतङ्गानपि
ग्राहं ग्राहमहो कियत्प्रकटयस्याखेटके पाटवम् ॥
गृह्यन्तां करिणः प्रसह्य विनिहन्यन्तां वराहा वृका
भल्लूकाश्च तरक्षवश्च पथिकाः सन्तु त्वया निर्भयाः ।
आखून्कङ्क खराशशाननिमिषान्कीटान्पतङ्गानपि
ग्राहं ग्राहमहो कियत्प्रकटयस्याखेटके पाटवम् ॥
भल्लूकाश्च तरक्षवश्च पथिकाः सन्तु त्वया निर्भयाः ।
आखून्कङ्क खराशशाननिमिषान्कीटान्पतङ्गानपि
ग्राहं ग्राहमहो कियत्प्रकटयस्याखेटके पाटवम् ॥
अन्वयः
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करिणः प्रसह्य गृह्यन्ताम्, वराहाः वृकाः भल्लूकाः तरक्षवः च विनिहन्यन्ताम्, त्वया पथिकाः निर्भयाः सन्तु । अहो, आखून् कङ्क-खर-अशश-अनमिषान् कीटान् पतङ्गान् अपि ग्राहम् ग्राहम् आखेटके कियत् पाटवम् प्रकटयसि!
Summary
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Let elephants be captured by force; let boars, wolves, bears, and hyenas be killed, so that travelers may be fearless because of you. But alas, what great skill in hunting you display by repeatedly catching mice, herons, donkeys, hares, fish, insects, and moths!
पदच्छेदः
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| गृह्यन्तां | गृह्यन्ताम् (√ग्रह् भावकर्मणोः लोट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | let them be captured |
| करिणः | करिन् (१.३) | elephants |
| प्रसह्य | प्रसह्य (प्र√सह्+ल्यप्) | by force |
| विनिहन्यन्तां | विनिहन्यन्ताम् (वि+नि√हन् भावकर्मणोः लोट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | let them be killed |
| वराहाः | वराह (१.३) | boars |
| वृकाः | वृक (१.३) | wolves |
| भल्लूकाः | भल्लूक (१.३) | bears |
| च | च | and |
| तरक्षवः | तरक्षु (१.३) | hyenas |
| च | च | and |
| पथिकाः | पथिक (१.३) | travelers |
| सन्तु | सन्तु (√अस् कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | let them be |
| त्वया | युष्मद् (३.१) | by you |
| निर्भयाः | निर्भय (१.३) | fearless |
| आखून् | आखु (२.३) | mice |
| कङ्कखराशशाननिमिषान् | कङ्क–खर–अशश–अनमिष (२.३) | herons, donkeys, hares, fish |
| कीटान् | कीट (२.३) | insects |
| पतङ्गान् | पतङ्ग (२.३) | moths |
| अपि | अपि | also |
| ग्राहं | ग्राहम् (√ग्रह्+णमुल्) | catching |
| ग्राहम् | ग्राहम् (√ग्रह्+णमुल्) | repeatedly |
| अहो | अहो | alas |
| कियत् | कियत् (२.१) | what great |
| प्रकटयसि | प्रकटयसि (प्र√कट् +णिच् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you display |
| आखेटके | आखेटक (७.१) | in hunting |
| पाटवम् | पाटव (२.१) | skill |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| गृ | ह्य | न्तां | क | रि | णः | प्र | स | ह्य | वि | नि | ह | न्य | न्तां | व | रा | हा | वृ | का |
| भ | ल्लू | का | श्च | त | र | क्ष | व | श्च | प | थि | काः | स | न्तु | त्व | या | नि | र्भ | याः |
| आ | खू | न्क | ङ्क | ख | रा | श | शा | न | नि | मि | षा | न्की | टा | न्प | त | ङ्गा | न | पि |
| ग्रा | हं | ग्रा | ह | म | हो | कि | य | त्प्र | क | ट | य | स्या | खे | ट | के | पा | ट | वम् |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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