अस्तप्रत्युपकारगन्धमकृतस्वप्रार्थनापेक्षम-
प्यम्भोभिर्भुवमार्द्रयन्ति जलदा जीवन्त्यतो जन्तवः ।
दैवज्ञः पुनरस्ति वृष्टिरिति वागेका मयोक्तेति
यद्विश्वं क्रीतमिवाधिगच्छति तदेवाघूर्णते मर्मणि ॥
अस्तप्रत्युपकारगन्धमकृतस्वप्रार्थनापेक्षम-
प्यम्भोभिर्भुवमार्द्रयन्ति जलदा जीवन्त्यतो जन्तवः ।
दैवज्ञः पुनरस्ति वृष्टिरिति वागेका मयोक्तेति
यद्विश्वं क्रीतमिवाधिगच्छति तदेवाघूर्णते मर्मणि ॥
प्यम्भोभिर्भुवमार्द्रयन्ति जलदा जीवन्त्यतो जन्तवः ।
दैवज्ञः पुनरस्ति वृष्टिरिति वागेका मयोक्तेति
यद्विश्वं क्रीतमिवाधिगच्छति तदेवाघूर्णते मर्मणि ॥
अन्वयः
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जलदाः अस्त-प्रत्युपकार-गन्धम् अकृत-स्वप्रार्थना-अपेक्षम् अपि अम्भोभिः भुवम् आर्द्रयन्ति, अतः जन्तवः जीवन्ति। पुनः दैवज्ञः 'वृष्टिः अस्ति' इति एका वाक् मया उक्ता इति यत् विश्वम् क्रीतम् इव अधिगच्छति, तत् एव मर्मणि आघूर्णते।
Summary
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Clouds moisten the earth with their waters without any expectation of a return favor or even a prayer, and thus living beings survive. But the astrologer, just because he said the single sentence "There will be rain," considers the whole world as if purchased by him. This very thought pains my heart.
पदच्छेदः
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| अस्तप्रत्युपकारगन्धम् | अस्त–प्रत्युपकार–गन्ध (२.१) | without a whiff of expecting a return favor |
| अकृतस्वप्रार्थनापेक्षमपि | अकृत–स्वप्रार्थना–अपेक्ष (२.१)–अपि | and without expecting any prayer for themselves |
| अम्भोभिः | अम्भस् (३.३) | with waters |
| भुवम् | भू (२.१) | the earth |
| आर्द्रयन्ति | आर्द्रयन्ति (√आर्द्रय कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | they moisten |
| जलदाः | जलद (१.३) | clouds |
| जीवन्ति | जीवन्ति (√जीव् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | live |
| अतः | अतस् | from this |
| जन्तवः | जन्तु (१.३) | creatures |
| दैवज्ञः | दैवज्ञ (१.१) | the astrologer |
| पुनः | पुनर् | but |
| अस्ति | अस्ति (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | there is |
| वृष्टिः | वृष्टि (१.१) | rain |
| इति | इति | thus |
| वाक् | वाच् (१.१) | word |
| एका | एक (१.१) | one |
| मया | अस्मद् (३.१) | by me |
| उक्ता | उक्त (√वच्+क्त, १.१) | was spoken |
| इति | इति | thus |
| यत् | यद् (१.१) | the fact that |
| विश्वम् | विश्व (२.१) | the world |
| क्रीतम् | क्रीत (√क्री+क्त, २.१) | as if bought |
| इव | इव | as if |
| अधिगच्छति | अधिगच्छति (अधि√गम् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | he considers |
| तत् | तद् (१.१) | that |
| एव | एव | itself |
| आघूर्णते | आघूर्णते (आ√घूर्ण् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | spins/pains |
| मर्मणि | मर्मन् (७.१) | in the core of my heart |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | स्त | प्र | त्यु | प | का | र | ग | न्ध | म | कृ | त | स्व | प्रा | र्थ | ना | पे | क्ष | म |
| प्य | म्भो | भि | र्भु | व | मा | र्द्र | य | न्ति | ज | ल | दा | जी | व | न्त्य | तो | ज | न्त | वः |
| दै | व | ज्ञः | पु | न | र | स्ति | वृ | ष्टि | रि | ति | वा | गे | का | म | यो | क्ते | ति | य |
| द्वि | श्वं | क्री | त | मि | वा | धि | ग | च्छ | ति | त | दे | वा | घू | र्ण | ते | म | र्म | णि |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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