नाक्ष्णोर्गच्छसि गोचरं बहुतिथान्मासान्नभस्ये पुनः
सङ्घीभूय समेत्य वर्षसि निरुच्छ्वासं समन्तादपः ।
कालं कालमनुव्रजन्मितमिता मुञ्चस्यपश्चेत्ततः
किं जीमूत तव प्रणश्यति कियत्प्राणन्त्वतः प्राणिनः ॥
नाक्ष्णोर्गच्छसि गोचरं बहुतिथान्मासान्नभस्ये पुनः
सङ्घीभूय समेत्य वर्षसि निरुच्छ्वासं समन्तादपः ।
कालं कालमनुव्रजन्मितमिता मुञ्चस्यपश्चेत्ततः
किं जीमूत तव प्रणश्यति कियत्प्राणन्त्वतः प्राणिनः ॥
सङ्घीभूय समेत्य वर्षसि निरुच्छ्वासं समन्तादपः ।
कालं कालमनुव्रजन्मितमिता मुञ्चस्यपश्चेत्ततः
किं जीमूत तव प्रणश्यति कियत्प्राणन्त्वतः प्राणिनः ॥
अन्वयः
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(हे) जीमूत, बहुतिथान् मासान् अक्ष्णोः गोचरम् न गच्छसि । पुनः नभस्ये सङ्घीभूय समेत्य समन्तात् निरुच्छ्वासम् अपः वर्षसि । चेत् कालम् कालम् अनुव्रजन् मित-मिताः अपः मुञ्चसि, ततः तव कियत् किम् प्रणश्यति? अतः प्राणिनः प्राणन्तु ।
Summary
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O cloud, for many months you are not seen. Then, in the month of Bhadrapada, gathering together and assembling, you rain water incessantly from all sides. If, following the seasons, you release measured amounts of water, what great loss is it to you? From this, let living beings live.
पदच्छेदः
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| न | न | not |
| अक्ष्णोः | अक्षि (६.२) | of the eyes |
| गच्छसि | गच्छसि (√गम् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you come |
| गोचरं | गोचर (२.१) | into the range |
| बहुतिथान् | बहुतिथ (२.३) | many |
| मासान् | मास (२.३) | months |
| नभस्ये | नभस्य (७.१) | in the month of Bhadrapada |
| पुनः | पुनर् | again |
| सङ्घीभूय | सङ्घीभूय (√सङ्घ+च्वि+क्त्वा) | gathering together |
| समेत्य | समेत्य (सम्√इ+ल्यप्) | having assembled |
| वर्षसि | वर्षसि (√वृष् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you rain |
| निरुच्छ्वासं | निरुच्छ्वासम् | incessantly |
| समन्तात् | समन्तात् | from all sides |
| अपः | अप् (२.३) | water |
| कालं | काल (२.१) | season |
| कालम् | काल (२.१) | after season |
| अनुव्रजन् | अनुव्रजत् (अनु√व्रज्+शत्रृ, १.१) | following |
| मितमिताः | मित–मित (२.३) | measured |
| मुञ्चसि | मुञ्चसि (√मुच् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you release |
| अपः | अप् (२.३) | waters |
| चेत् | चेत् | if |
| ततः | ततः | then |
| किं | किम् | what |
| जीमूत | जीमूत (८.१) | O cloud |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| प्रणश्यति | प्रणश्यति (प्र√नश् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | is lost |
| कियत् | कियत् (१.१) | how much |
| प्राणन्तु | प्राणन्तु (प्र√अन् कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | let them live |
| अतः | अतः | from this |
| प्राणिनः | प्राणिन् (१.३) | living beings |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ना | क्ष्णो | र्ग | च्छ | सि | गो | च | रं | ब | हु | ति | था | न्मा | सा | न्न | भ | स्ये | पु | नः |
| स | ङ्घी | भू | य | स | मे | त्य | व | र्ष | सि | नि | रु | च्छ्वा | सं | स | म | न्ता | द | पः |
| का | लं | का | ल | म | नु | व्र | ज | न्मि | त | मि | ता | मु | ञ्च | स्य | प | श्चे | त्त | तः |
| किं | जी | मू | त | त | व | प्र | ण | श्य | ति | कि | य | त्प्रा | ण | न्त्व | तः | प्रा | णि | नः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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