पान्थेषु व्ययितं फलं पथिषु यैर्नम्रैः सदा पादपै-
र्यैरप्युन्नतमौलिगोपितफलैः कोणे निलीय स्थितम् ।
दावेन ज्वलता द्वयेऽपि खलु ते निःशेषिताः साम्प्रतं
पुण्यं पापमिति स्थितं द्वयमिदं तेषां द्वयानां पृथक् ॥
पान्थेषु व्ययितं फलं पथिषु यैर्नम्रैः सदा पादपै-
र्यैरप्युन्नतमौलिगोपितफलैः कोणे निलीय स्थितम् ।
दावेन ज्वलता द्वयेऽपि खलु ते निःशेषिताः साम्प्रतं
पुण्यं पापमिति स्थितं द्वयमिदं तेषां द्वयानां पृथक् ॥
र्यैरप्युन्नतमौलिगोपितफलैः कोणे निलीय स्थितम् ।
दावेन ज्वलता द्वयेऽपि खलु ते निःशेषिताः साम्प्रतं
पुण्यं पापमिति स्थितं द्वयमिदं तेषां द्वयानां पृथक् ॥
अन्वयः
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यैः नमैः पादपैः सदा पथिषु पान्थेषु फलम् व्ययितम्, यैः अपि उन्नत-मौलि-गोपित-फलैः कोणे निलीय स्थितम्, ते द्वये अपि खलु ज्वलता दावेन साम्प्रतम् निःशेषिताः । तेषाम् द्वयानाम् इदम् द्वयम् पुण्यम् पापम् इति पृथक् स्थितम् ।
Summary
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Those humble trees that always spent their fruit on travelers on the paths, and also those that stood hidden in a corner with fruits concealed in their high tops—both types have now been completely destroyed by the blazing forest fire. For these two groups, two separate things remain: merit and sin, respectively.
पदच्छेदः
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| पान्थेषु | पान्थ (७.३) | on travelers |
| व्ययितं | व्ययित (√व्यय्+क्त, १.१) | was spent |
| फलं | फल (१.१) | fruit |
| पथिषु | पथिन् (७.३) | on the paths |
| यैः | यद् (३.३) | by which |
| नमैः | नम्र (३.३) | humble |
| सदा | सदा | always |
| पादपैः | पादप (३.३) | trees |
| यैः | यद् (३.३) | by which |
| अपि | अपि | also |
| उन्नतमौलिगोपितफलैः | उन्नत–मौलि–गोपित–फल (३.३) | with fruits concealed in high tops |
| कोणे | कोण (७.१) | in a corner |
| निलीय | निलीय (नि√ली+ल्यप्) | having hidden |
| स्थितम् | स्थित (√स्था+क्त, १.१) | stood |
| दावेन | दाव (३.१) | by the forest fire |
| ज्वलता | ज्वलत् (√ज्वल्+शत्रृ, ३.१) | blazing |
| द्वये | द्वय (१.३) | both types |
| अपि | अपि | also |
| खलु | खलु | indeed |
| ते | तद् (१.३) | they |
| निःशेषिताः | निःशेषित (निर्√शिष्+णिच्+क्त, १.३) | were completely destroyed |
| साम्प्रतं | साम्प्रतम् | now |
| पुण्यं | पुण्य (१.१) | merit |
| पापम् | पाप (१.१) | sin |
| इति | इति | thus |
| स्थितं | स्थित (√स्था+क्त, १.१) | remains |
| द्वयम् | द्वय (१.१) | two things |
| इदं | इदम् (१.१) | this |
| तेषां | तद् (६.३) | of them |
| द्वयानां | द्वय (६.३) | of the two groups |
| पृथक् | पृथक् | separately |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पा | न्थे | षु | व्य | यि | तं | फ | लं | प | थि | षु | यै | र्न | म्रैः | स | दा | पा | द | पै |
| र्यै | र | प्यु | न्न | त | मौ | लि | गो | पि | त | फ | लैः | को | णे | नि | ली | य | स्थि | तम् |
| दा | वे | न | ज्व | ल | ता | द्व | ये | ऽपि | ख | लु | ते | निः | शे | षि | ताः | सा | म्प्र | तं |
| पु | ण्यं | पा | प | मि | ति | स्थि | तं | द्व | य | मि | दं | ते | षां | द्व | या | नां | पृ | थक् |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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