स्वादून्येव फलानि सन्ति सुरभीण्येव प्रसूनानि च
स्वान्तं चाप्युपकर्तुमर्हति जने साध्यं वनस्थेन किम् ।
भाग्यं ह्येतदतर्कितं वनतरोः पान्थो यदा तापस-
श्छायामस्य यदृच्छया फलवतीमध्यास्त गन्धोत्तराम् ॥
स्वादून्येव फलानि सन्ति सुरभीण्येव प्रसूनानि च
स्वान्तं चाप्युपकर्तुमर्हति जने साध्यं वनस्थेन किम् ।
भाग्यं ह्येतदतर्कितं वनतरोः पान्थो यदा तापस-
श्छायामस्य यदृच्छया फलवतीमध्यास्त गन्धोत्तराम् ॥
स्वान्तं चाप्युपकर्तुमर्हति जने साध्यं वनस्थेन किम् ।
भाग्यं ह्येतदतर्कितं वनतरोः पान्थो यदा तापस-
श्छायामस्य यदृच्छया फलवतीमध्यास्त गन्धोत्तराम् ॥
अन्वयः
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स्वादूनि एव फलानि सन्ति, सुरभीणि एव प्रसूनानि च (सन्ति) । (तत्) जने उपकर्तुम् अर्हति । वनस्थेन स्वान्तम् च अपि किम् साध्यम्? हि एतत् वनतरोः अतर्कितम् भाग्यम् यदा तापसः पान्थः यदृच्छया अस्य फलवतीम् गन्धोत्तराम् छायाम् अध्यास्त ।
Summary
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A tree has sweet fruits and fragrant flowers. It is capable of helping people. What can be achieved by staying in the forest, even for one's own soul? Indeed, it is the unforeseen good fortune of a forest tree when a traveler or an ascetic, by chance, rests in its fruitful, fragrant shade.
पदच्छेदः
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| स्वादूनि | स्वादु (१.३) | sweet |
| एव | एव | indeed |
| फलानि | फल (१.३) | fruits |
| सन्ति | सन्ति (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | are |
| सुरभीणि | सुरभि (१.३) | fragrant |
| एव | एव | indeed |
| प्रसूनानि | प्रसून (१.३) | flowers |
| च | च | and |
| स्वान्तं | स्वान्त (२.१) | one's own soul |
| च | च | and |
| अपि | अपि | also |
| उपकर्तुम् | उपकर्तुम् (उप√कृ+तुमुन्) | to help |
| अर्हति | अर्हति (√अर्ह् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | is able |
| जने | जन (७.१) | people |
| साध्यं | साध्य (१.१) | to be achieved |
| वनस्थेन | वनस्थ (३.१) | by one staying in the forest |
| किम् | किम् (१.१) | what |
| भाग्यं | भाग्य (१.१) | fortune |
| हि | हि | indeed |
| एतत् | एतद् (१.१) | this |
| अतर्कितं | अतर्कित (√तर्क्+क्त, १.१) | unforeseen |
| वनतरोः | वनतरु (६.१) | of a forest tree |
| पान्थः | पान्थ (१.१) | a traveler |
| यदा | यदा | when |
| तापसः | तापस (१.१) | an ascetic |
| छायाम् | छाया (२.१) | shade |
| अस्य | इदम् (६.१) | its |
| यदृच्छया | यदृच्छा (३.१) | by chance |
| फलवतीम् | फलवत् (२.१) | fruitful |
| अध्यास्त | अध्यास्त (अधि√आस् कर्तरि लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | rested in |
| गन्धोत्तराम् | गन्धोत्तरा (२.१) | very fragrant |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्वा | दू | न्ये | व | फ | ला | नि | स | न्ति | सु | र | भी | ण्ये | व | प्र | सू | ना | नि | च |
| स्वा | न्तं | चा | प्यु | प | क | र्तु | म | र्ह | ति | ज | ने | सा | ध्यं | व | न | स्थे | न | किम् |
| भा | ग्यं | ह्ये | त | द | त | र्कि | तं | व | न | त | रोः | पा | न्थो | य | दा | ता | प | स |
| श्छा | या | म | स्य | य | दृ | च्छ | या | फ | ल | व | ती | म | ध्या | स्त | ग | न्धो | त्त | राम् |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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