भूमिष्ठा अतिपावनीः सुरभिलाः स्वाद्वीरपः सन्त्यज-
न्याचत्यम्बुदमम्बु चातकगणो यत्तेन किं साध्यते ।
किं तस्मै द्विगुणं प्रवर्षति घनः किं वा तपः साध्यते
प्राग्जन्मन्यवितीर्णवारिकणिकः पापी स इत्यूह्यते ॥
भूमिष्ठा अतिपावनीः सुरभिलाः स्वाद्वीरपः सन्त्यज-
न्याचत्यम्बुदमम्बु चातकगणो यत्तेन किं साध्यते ।
किं तस्मै द्विगुणं प्रवर्षति घनः किं वा तपः साध्यते
प्राग्जन्मन्यवितीर्णवारिकणिकः पापी स इत्यूह्यते ॥
न्याचत्यम्बुदमम्बु चातकगणो यत्तेन किं साध्यते ।
किं तस्मै द्विगुणं प्रवर्षति घनः किं वा तपः साध्यते
प्राग्जन्मन्यवितीर्णवारिकणिकः पापी स इत्यूह्यते ॥
अन्वयः
AI
भूमिष्ठाः अतिपावनीः सुरभिलाः स्वाद्वीः अपः सन्तीः त्यजन् चातकगणः अम्बुदम् अम्बु याचति यत्, तेन किम् साध्यते? घनः तस्मै किम् द्विगुणम् प्रवर्षति? किम् वा तपः साध्यते? सः प्राक्-जन्मनि अवितीर्ण-वारि-कणिकः पापी इति ऊह्यते ।
Summary
AI
There are extremely pure, fragrant, and sweet waters on the earth. What is achieved by the flock of Chataka birds that, abandoning these, begs the cloud for water? Does the cloud rain twice as much for it? Or is some penance accomplished? It is inferred that it is a sinner who, in a previous life, did not offer even a drop of water.
पदच्छेदः
AI
| भूमिष्ठाः | भूमिष्ठ (२.३) | existing on earth |
| अतिपावनीः | अतिपावनी (२.३) | extremely pure |
| सुरभिलाः | सुरभिल (२.३) | fragrant |
| स्वाद्वीः | स्वादु (२.३) | sweet |
| अपः | अप् (२.३) | waters |
| सन्तीः | सत् (√अस्+शत्रृ, २.३) | existing |
| त्यजन् | त्यजत् (√त्यज्+शत्रृ, १.१) | abandoning |
| याचति | याचति (√याच् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | begs |
| अम्बुदम् | अम्बुद (२.१) | the cloud |
| अम्बु | अम्बु (२.१) | for water |
| चातकगणः | चातकगण (१.१) | the flock of Chataka birds |
| यत् | यद् | that |
| तेन | तद् (३.१) | by that |
| किम् | किम् (१.१) | what |
| साध्यते | साध्यते (√साध् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is accomplished |
| किम् | किम् | does |
| तस्मै | तद् (४.१) | for it |
| द्विगुणं | द्विगुणम् | twice as much |
| प्रवर्षति | प्रवर्षति (प्र√वृष् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | rain |
| घनः | घन (१.१) | the cloud |
| किं | किम् | is |
| वा | वा | or |
| तपः | तपस् (१.१) | penance |
| साध्यते | साध्यते (√साध् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | accomplished |
| प्राग्जन्मनि | प्राग्जन्मन् (७.१) | in a previous life |
| अवितीर्णवारिकणिकः | अवितीर्ण–वारि–कणिक (१.१) | one who did not offer a drop of water |
| पापी | पापिन् (१.१) | a sinner |
| सः | तद् (१.१) | he |
| इति | इति | thus |
| ऊह्यते | ऊह्यते (√ऊह् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is inferred |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| भू | मि | ष्ठा | अ | ति | पा | व | नीः | सु | र | भि | लाः | स्वा | द्वी | र | पः | स | न्त्य | ज |
| न्या | च | त्य | म्बु | द | म | म्बु | चा | त | क | ग | णो | य | त्ते | न | किं | सा | ध्य | ते |
| किं | त | स्मै | द्वि | गु | णं | प्र | व | र्ष | ति | घ | नः | किं | वा | त | पः | सा | ध्य | ते |
| प्रा | ग्ज | न्म | न्य | वि | ती | र्ण | वा | रि | क | णि | कः | पा | पी | स | इ | त्यू | ह्य | ते |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.