प्रागभ्यागतया किलाभ्रसरिता सम्प्लावयन्त्या मही-
मम्भोधिः स्वयमप्यपूर्यत सकृत्तत्तज्जलाधारवत् ।
आस्तेऽयं कथमक्षयो निधिरपां ते ते कथं वासते
निर्व्याजाम्बुधराम्बुदानसुकृतं सिद्धं तदित्थं पुनः ॥
प्रागभ्यागतया किलाभ्रसरिता सम्प्लावयन्त्या मही-
मम्भोधिः स्वयमप्यपूर्यत सकृत्तत्तज्जलाधारवत् ।
आस्तेऽयं कथमक्षयो निधिरपां ते ते कथं वासते
निर्व्याजाम्बुधराम्बुदानसुकृतं सिद्धं तदित्थं पुनः ॥
मम्भोधिः स्वयमप्यपूर्यत सकृत्तत्तज्जलाधारवत् ।
आस्तेऽयं कथमक्षयो निधिरपां ते ते कथं वासते
निर्व्याजाम्बुधराम्बुदानसुकृतं सिद्धं तदित्थं पुनः ॥
अन्वयः
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प्राक् महीम् सम्प्लावयन्त्या अभ्यागतया अभ्रसरिता किल अम्भोधिः स्वयम् अपि तत्-तत्-जलाधारवत् सकृत् अपूर्यत । अयम् अपाम् अक्षयः निधिः कथम् आस्ते? ते ते (जलाधाराः) कथम् वा आसते? पुनः इत्थम् तत् निर्व्याज-अम्बुधर-अम्बुदान-सुकृतम् सिद्धम् ।
Summary
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In the beginning, the ocean itself was filled once by the celestial river (Ganga) that came flooding the earth, just like other reservoirs. How then does it remain an inexhaustible treasury of water, and how do those other reservoirs also remain full? It is thus proven that this is the result of the selfless good deed of the clouds giving water.
पदच्छेदः
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| प्राक् | प्राच् | in the beginning |
| अभ्यागतया | अभ्यागत (अभि+आ√गम्+क्त, ३.१) | by the one that arrived |
| किल | किल | indeed |
| अभ्रसरिता | अभ्रसरित् (३.१) | by the celestial river |
| सम्प्लावयन्त्या | सम्प्लावयन्त् (सम्√प्लु+णिच्+शत्रृ, ३.१) | by the one flooding |
| महीम् | मही (२.१) | the earth |
| अम्भोधिः | अम्भोधि (१.१) | the ocean |
| स्वयम् | स्वयम् | itself |
| अपि | अपि | also |
| अपूर्यत | अपूर्यत (√पृ भावकर्मणोः लङ् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was filled |
| सकृत् | सकृत् | once |
| तत्तज्जलाधारवत् | तत्–तत्–जलाधार–वत् | like other reservoirs |
| आस्ते | आस्ते (√आस् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | remains |
| अयम् | इदम् (१.१) | this |
| कथम् | कथम् | how |
| अक्षयः | अक्षय (१.१) | inexhaustible |
| निधिः | निधि (१.१) | treasury |
| अपाम् | अप् (६.३) | of waters |
| ते | तद् (१.३) | those |
| ते | तद् (१.३) | those |
| कथम् | कथम् | how |
| वा | वा | or |
| आसते | आसते (√आस् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | remain |
| निर्व्याजाम्बुधराम्बुदानसुकृतम् | निर्व्याज–अम्बुधर–अम्बु–दान–सुकृत (१.१) | the selfless good deed of the clouds giving water |
| सिद्धम् | सिद्ध (√सिध्+क्त, १.१) | is proven |
| तत् | तद् (१.१) | that |
| इत्थम् | इत्थम् | thus |
| पुनः | पुनर् | again |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्रा | ग | भ्या | ग | त | या | कि | ला | भ्र | स | रि | ता | स | म्प्ला | व | य | न्त्या | म | ही |
| म | म्भो | धिः | स्व | य | म | प्य | पू | र्य | त | स | कृ | त्त | त्त | ज्ज | ला | धा | र | वत् |
| आ | स्ते | ऽयं | क | थ | म | क्ष | यो | नि | धि | र | पां | ते | ते | क | थं | वा | स | ते |
| नि | र्व्या | जा | म्बु | ध | रा | म्बु | दा | न | सु | कृ | तं | सि | द्धं | त | दि | त्थं | पु | नः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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