काका मूर्ध्नि सुखं वसन्ति शतशः शाखासु शाखामृगा
घूकाः कोटरगह्वरेषु मशकैर्दंशैश्च सान्द्रं तलम् ।
आधारः कियतामसि स्थिरतरं शुद्धं च लब्धं यशः
पान्था नोपसरन्ति चेत्क्षतमितः किं वृक्षराजस्य ते ॥
काका मूर्ध्नि सुखं वसन्ति शतशः शाखासु शाखामृगा
घूकाः कोटरगह्वरेषु मशकैर्दंशैश्च सान्द्रं तलम् ।
आधारः कियतामसि स्थिरतरं शुद्धं च लब्धं यशः
पान्था नोपसरन्ति चेत्क्षतमितः किं वृक्षराजस्य ते ॥
घूकाः कोटरगह्वरेषु मशकैर्दंशैश्च सान्द्रं तलम् ।
आधारः कियतामसि स्थिरतरं शुद्धं च लब्धं यशः
पान्था नोपसरन्ति चेत्क्षतमितः किं वृक्षराजस्य ते ॥
अन्वयः
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(हे वृक्षराज) ते मूर्ध्नि शतशः काकाः सुखम् वसन्ति, शाखासु शाखामृगाः (वसन्ति), कोटरगह्वरेषु घूकाः (वसन्ति), तलम् मशकैः दंशैः च सान्द्रम् (अस्ति) । (त्वम्) कियताम् आधारः असि । स्थिरतरम् शुद्धम् च यशः लब्धम् । चेत् पान्थाः न उपसरन्ति, इतः ते किम् क्षतम्?
Summary
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O king of trees, hundreds of crows live on your crown, monkeys on your branches, and owls in your hollows; your base is thick with mosquitoes. You support so many and have earned stable, pure fame. If travelers do not approach you because of these inhabitants, what harm is it to you? A great person's worth is not diminished if common people, deterred by their formidable associates, stay away.
पदच्छेदः
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| काकाः | काक (१.३) | crows |
| मूर्ध्नि | मूर्धन् (७.१) | on the head |
| सुखं | सुखम् | happily |
| वसन्ति | वसन्ति (√वस् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | live |
| शतशः | शतशः | in hundreds |
| शाखासु | शाखा (७.३) | on the branches |
| शाखामृगाः | शाखा–मृग (१.३) | monkeys |
| घूकाः | घूक (१.३) | owls |
| कोटरगह्वरेषु | कोटर–गह्वर (७.३) | in the hollows of the trunk |
| मशकैः | मशक (३.३) | with mosquitoes |
| दंशैः | दंश (३.३) | with gadflies |
| च | च | and |
| सान्द्रं | सान्द्र (१.१) | is thick |
| तलम् | तल (१.१) | the base |
| आधारः | आधार (१.१) | a support |
| कियताम् | कियत् (६.३) | for how many |
| असि | असि (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you are |
| स्थिरतरं | स्थिरतर (१.१) | very stable |
| शुद्धं | शुद्ध (१.१) | and pure |
| च | च | and |
| लब्धं | लब्ध (√लभ्+क्त, १.१) | has been obtained |
| यशः | यशस् (१.१) | fame |
| पान्थाः | पथिन् (१.३) | travelers |
| न | न | not |
| उपसरन्ति | उपसरन्ति (उप√सृ कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | approach |
| चेत् | चेत् | if |
| क्षतम् | क्षत (१.१) | harm |
| इतः | इतः | from this |
| किं | किम् (१.१) | what |
| वृक्षराजस्य | वृक्ष–राजन् (६.१) | of the king of trees |
| ते | युष्मद् (६.१) | to you |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| का | का | मू | र्ध्नि | सु | खं | व | स | न्ति | श | त | शः | शा | खा | सु | शा | खा | मृ | गा |
| घू | काः | को | ट | र | ग | ह्व | रे | षु | म | श | कै | र्दं | शै | श्च | सा | न्द्रं | त | लम् |
| आ | धा | रः | कि | य | ता | म | सि | स्थि | र | त | रं | शु | द्धं | च | ल | ब्धं | य | शः |
| पा | न्था | नो | प | स | र | न्ति | चे | त्क्ष | त | मि | तः | किं | वृ | क्ष | रा | ज | स्य | ते |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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