द्वारं न प्रजहातु जातु नियतं जागर्तु रात्रीरपि
स्वल्पेनापि मुदं प्रयातु किमतः श्वा श्वैव तावानपि ।
सम्पाद्यो महता धनेन सततं भोज्यश्च सान्त्वैरिति
त्यक्त्वा मत्तगजं पदेऽस्य महतः स्थाप्यः किमेतावता ॥
द्वारं न प्रजहातु जातु नियतं जागर्तु रात्रीरपि
स्वल्पेनापि मुदं प्रयातु किमतः श्वा श्वैव तावानपि ।
सम्पाद्यो महता धनेन सततं भोज्यश्च सान्त्वैरिति
त्यक्त्वा मत्तगजं पदेऽस्य महतः स्थाप्यः किमेतावता ॥
स्वल्पेनापि मुदं प्रयातु किमतः श्वा श्वैव तावानपि ।
सम्पाद्यो महता धनेन सततं भोज्यश्च सान्त्वैरिति
त्यक्त्वा मत्तगजं पदेऽस्य महतः स्थाप्यः किमेतावता ॥
अन्वयः
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श्वा जातु द्वारम् न प्रजहातु, नियतम् रात्रीः अपि जागर्तु, स्वल्पेन अपि मुदम् प्रयातु । अतः किम्? श्वा तावान् अपि श्वा एव । महता धनेन सम्पाद्यः, सततं सान्त्वैः भोज्यः च इति, मत्तगजम् त्यक्त्वा, अस्य पदे महतः एतावता किम् स्थाप्यः?
Summary
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Let a dog never leave the door, stay awake all night, and be happy with a little. So what? A dog is still just a dog. Should one, for these reasons, abandon a majestic elephant—which must be acquired with great wealth and constantly fed with kind words—and place this dog in its high position? This argues that minor virtues in a lowly person do not qualify them to replace a truly great individual, despite the latter's high maintenance.
पदच्छेदः
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| द्वारं | द्वार (२.१) | the door |
| न | न | not |
| प्रजहातु | प्रजहातु (प्र√हा कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | let it leave |
| जातु | जातु | ever |
| नियतं | नियतम् | constantly |
| जागर्तु | जागर्तु (√जागृ कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | let it stay awake |
| रात्रीः | रात्रि (२.३) | at nights |
| अपि | अपि | even |
| स्वल्पेन | स्वल्प (३.१) | with a little |
| अपि | अपि | even |
| मुदं | मुद् (२.१) | joy |
| प्रयातु | प्रयातु (प्र√या कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | let it attain |
| किम् | किम् (१.१) | what |
| अतः | अतः | from this |
| श्वा | श्वन् (१.१) | a dog |
| श्वा | श्वन् (१.१) | a dog |
| एव | एव | only |
| तावान् | तावत् (१.१) | so much |
| अपि | अपि | even |
| सम्पाद्यः | सम्पाद्य (सम्√पद्+ण्यत्, १.१) | to be acquired |
| महता | महत् (३.१) | with great |
| धनेन | धन (३.१) | wealth |
| सततं | सततम् | constantly |
| भोज्यः | भोज्य (√भुज्+ण्यत्, १.१) | to be fed |
| च | च | and |
| सान्त्वैः | सान्त्व (३.३) | with kind words |
| इति | इति | thus |
| त्यक्त्वा | त्यक्त्वा (√त्यज्+क्त्वा) | having abandoned |
| मत्तगजं | मत्त–गज (२.१) | a majestic elephant |
| पदे | पद (७.१) | in the place |
| अस्य | इदम् (६.१) | of it |
| महतः | महत् (६.१) | of the great one |
| स्थाप्यः | स्थाप्य (√स्था+ण्यत्, १.१) | to be placed |
| किम् | किम् (१.१) | why |
| एतावता | एतावत् (३.१) | by this much |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| द्वा | रं | न | प्र | ज | हा | तु | जा | तु | नि | य | तं | जा | ग | र्तु | रा | त्री | र | पि |
| स्व | ल्पे | ना | पि | मु | दं | प्र | या | तु | कि | म | तः | श्वा | श्वै | व | ता | वा | न | पि |
| स | म्पा | द्यो | म | ह | ता | ध | ने | न | स | त | तं | भो | ज्य | श्च | सा | न्त्वै | रि | ति |
| त्य | क्त्वा | म | त्त | ग | जं | प | दे | ऽस्य | म | ह | तः | स्था | प्यः | कि | मे | ता | व | ता |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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