आसन्नो मधुरागतं वनभुवः साम्राज्यमित्यद्भुताः
श्रूयन्ते गिर एव तत्त्वमिह तु ज्ञातुं विधातुः क्षमम् ।
यत्पर्णैस्त्रुटितं यदप्युपरतं पुष्पोद्गमैः शाखिनां
यद्ग्लानं विटपैरिदं पुनरिह प्रत्यक्षमालक्ष्यते ॥
आसन्नो मधुरागतं वनभुवः साम्राज्यमित्यद्भुताः
श्रूयन्ते गिर एव तत्त्वमिह तु ज्ञातुं विधातुः क्षमम् ।
यत्पर्णैस्त्रुटितं यदप्युपरतं पुष्पोद्गमैः शाखिनां
यद्ग्लानं विटपैरिदं पुनरिह प्रत्यक्षमालक्ष्यते ॥
श्रूयन्ते गिर एव तत्त्वमिह तु ज्ञातुं विधातुः क्षमम् ।
यत्पर्णैस्त्रुटितं यदप्युपरतं पुष्पोद्गमैः शाखिनां
यद्ग्लानं विटपैरिदं पुनरिह प्रत्यक्षमालक्ष्यते ॥
अन्वयः
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मधुरागतम् वनभुवः साम्राज्यम् इति अद्भुताः गिरः एव श्रूयन्ते । तु इह तत्त्वम् ज्ञातुम् विधातुः क्षमम् । यत् पर्णैः त्रुटितम्, यत् अपि पुष्पोद्गमैः शाखिनाम् उपरम्, यत् विटपैः ग्लानम्, इदम् पुनः इह प्रत्यक्षम् आलक्ष्यते ।
Summary
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Wonderful words are heard, such as 'Spring's arrival is near' and 'The empire of the forest is at hand.' But only the Creator can know the truth here. What is actually observed is that the trees are bereft of leaves, the blossoming of flowers has ceased, and the branches are withered. This points to the discrepancy between hopeful promises and a harsh reality.
पदच्छेदः
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| आसन्नः | आसन्न (आ√सद्+क्त, १.१) | is near |
| मधुरागतं | मधु–आगत (१.१) | the arrival of spring |
| वनभुवः | वनभू (६.१) | of the forest land |
| साम्राज्यम् | साम्राज्य (१.१) | the empire |
| इति | इति | thus |
| अद्भुताः | अद्भुत (१.३) | wonderful |
| श्रूयन्ते | श्रूयन्ते (√श्रु भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | are heard |
| गिरः | गिर् (१.३) | words |
| एव | एव | only |
| तत्त्वम् | तत्त्व (२.१) | the truth |
| इह | इह | here |
| तु | तु | but |
| ज्ञातुं | ज्ञातुम् (√ज्ञा+तुमुन्) | to know |
| विधातुः | विधातृ (१.१) | the Creator |
| क्षमम् | क्षम (१.१) | is able |
| यत् | यद् (१.१) | that |
| पर्णैः | पर्ण (३.३) | with leaves |
| त्रुटितं | त्रुटित (√त्रुट्+क्त, १.१) | is broken/bereft |
| यत् | यद् (१.१) | that |
| अपि | अपि | also |
| उपरतं | उपरत (उप√रम्+क्त, १.१) | has ceased |
| पुष्पोद्गमैः | पुष्प–उद्गम (३.३) | with the blossoming of flowers |
| शाखिनां | शाखिन् (६.३) | of the trees |
| यत् | यद् (१.१) | that |
| ग्लानं | ग्लान (√ग्लै+क्त, १.१) | is withered |
| विटपैः | विटप (३.३) | with branches |
| इदं | इदम् (१.१) | this |
| पुनः | पुनर् | however |
| इह | इह | here |
| प्रत्यक्षम् | प्रत्यक्षम् | visibly |
| आलक्ष्यते | आलक्ष्यते (आ√लक्ष् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is observed |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | स | न्नो | म | धु | रा | ग | तं | व | न | भु | वः | सा | म्रा | ज्य | मि | त्य | द्भु | ताः |
| श्रू | य | न्ते | गि | र | ए | व | त | त्त्व | मि | ह | तु | ज्ञा | तुं | वि | धा | तुः | क्ष | मम् |
| य | त्प | र्णै | स्त्रु | टि | तं | य | द | प्यु | प | र | तं | पु | ष्पो | द्ग | मैः | शा | खि | नां |
| य | द्ग्ला | नं | वि | ट | पै | रि | दं | पु | न | रि | ह | प्र | त्य | क्ष | मा | ल | क्ष्य | ते |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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