किं पुष्णासि मृगान्मृगादनकुलात्किं वा परित्रायसे
त्वद्भाग्येन तथाप्यमी वनभुवि स्वैरं चरित्वा तृणम् ।
त्वां राजानमुपासितुं यदि किल श्रद्धां निबध्नन्ति तकि
पारीन्द्र गुहागृहादपि विनिर्गन्तुं तवैष श्रमः ॥
किं पुष्णासि मृगान्मृगादनकुलात्किं वा परित्रायसे
त्वद्भाग्येन तथाप्यमी वनभुवि स्वैरं चरित्वा तृणम् ।
त्वां राजानमुपासितुं यदि किल श्रद्धां निबध्नन्ति तकि
पारीन्द्र गुहागृहादपि विनिर्गन्तुं तवैष श्रमः ॥
त्वद्भाग्येन तथाप्यमी वनभुवि स्वैरं चरित्वा तृणम् ।
त्वां राजानमुपासितुं यदि किल श्रद्धां निबध्नन्ति तकि
पारीन्द्र गुहागृहादपि विनिर्गन्तुं तवैष श्रमः ॥
अन्वयः
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(हे) पारीन्द्र, मृगान् किम् पुष्णासि? मृगादनकुलात् (तान्) किम् वा परित्रायसे? तथापि अमी त्वत् भाग्येन वनभुवि स्वैरम् तृणम् चरित्वा, यदि किल त्वाम् राजानम् उपासितुम् श्रद्धाम् निबध्नन्ति, तत् (तर्हि) गुहागृहात् अपि विनिर्गन्तुम् तव एषः श्रमः किम्?
Summary
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O Lion, do you nourish the deer? Do you protect them from predators? Even so, by your good fortune, these deer, after grazing freely on grass in the forest, serve you as their king. If so, why do you exhibit this laziness to even come out of your cave-home?
पदच्छेदः
AI
| किम् | किम् (२.१) | why |
| पुष्णासि | पुष्णासि (√पुष् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | do you nourish |
| मृगान् | मृग (२.३) | the deer |
| मृगादनकुलात् | मृग–अदन–कुल (५.१) | from the pack of predators |
| किम् | किम् (२.१) | why |
| वा | वा | or |
| परित्रायसे | परित्रायसे (परि√त्रै कर्तरि लट् (आत्मने.) म.पु. एक.) | do you protect |
| त्वद्भाग्येन | युष्मद्–भाग्य (३.१) | by your fortune |
| तथापि | तथापि | even so |
| अमी | अदस् (१.३) | these |
| वनभुवि | वन–भू (७.१) | in the forest land |
| स्वैरम् | स्वैरम् | freely |
| चरित्वा | चरित्वा (√चर्+क्त्वा) | having grazed |
| तृणम् | तृण (२.१) | grass |
| त्वाम् | युष्मद् (२.१) | you |
| राजानम् | राजन् (२.१) | as king |
| उपासितुम् | उपासितुम् (उप√आस्+तुमुन्) | to serve |
| यदि | यदि | if |
| किल | किल | indeed |
| श्रद्धाम् | श्रद्धा (२.१) | faith/desire |
| निबध्नन्ति | निबध्नन्ति (नि√बन्ध् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | they develop |
| तत् | तद् (१.१) | then |
| किम् | किम् (१.१) | why |
| पारीन्द्र | पारीन्द्र (८.१) | O lion |
| गुहागृहात् | गुहा–गृह (५.१) | from your cave-home |
| अपि | अपि | even |
| विनिर्गन्तुम् | विनिर्गन्तुम् (वि+निर्√गम्+तुमुन्) | to come out |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| एषः | एतद् (१.१) | this |
| श्रमः | श्रम (१.१) | effort |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| किं | पु | ष्णा | सि | मृ | गा | न्मृ | गा | द | न | कु | ला | त्किं | वा | प | रि | त्रा | य | से |
| त्व | द्भा | ग्ये | न | त | था | प्य | मी | व | न | भु | वि | स्वै | रं | च | रि | त्वा | तृ | णम् |
| त्वां | रा | जा | न | मु | पा | सि | तुं | य | दि | कि | ल | श्र | द्धां | नि | ब | ध्न | न्ति | त |
| कि | पा | री | न्द्र | गु | हा | गृ | हा | द | पि | वि | नि | र्ग | न्तुं | त | वै | ष | श्र | मः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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