यन्मूले निखिलागमानुपदिशत्तत्त्वं परं शाङ्करं
यत्पर्णे जगतां निधिः स तु वटो नाम्नापि न स्वीकृतः ।
यच्छाखानिलयः पिशाचनिचयो यन्मूलगाः पन्नगा-
स्तस्याश्वत्थतरोः पुनः कति नमस्काराः कति प्रार्थनाः ॥
यन्मूले निखिलागमानुपदिशत्तत्त्वं परं शाङ्करं
यत्पर्णे जगतां निधिः स तु वटो नाम्नापि न स्वीकृतः ।
यच्छाखानिलयः पिशाचनिचयो यन्मूलगाः पन्नगा-
स्तस्याश्वत्थतरोः पुनः कति नमस्काराः कति प्रार्थनाः ॥
यत्पर्णे जगतां निधिः स तु वटो नाम्नापि न स्वीकृतः ।
यच्छाखानिलयः पिशाचनिचयो यन्मूलगाः पन्नगा-
स्तस्याश्वत्थतरोः पुनः कति नमस्काराः कति प्रार्थनाः ॥
अन्वयः
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यत् मूले परम् शाङ्करम् तत्त्वम् निखिल आगमान् उपदिशत् (शिवः आस्ते), यत् पर्णे जगताम् निधिः (विष्णुः शेते), सः वटः तु नाम्ना अपि न स्वीकृतः । यत् शाखा निलयः पिशाचनिचयः, यत् मूलगाः पन्नगाः, तस्य अश्वत्थतरोः पुनः कति नमस्काराः, कति प्रार्थनाः (क्रियन्ते)?
Summary
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The Banyan tree, at whose root Shiva teaches the supreme truth and on whose leaf Vishnu rests, is not even acknowledged by name. Yet, the Ashvattha tree, whose branches house ghosts and whose roots shelter snakes, receives countless salutations and prayers. This highlights how people often revere those with fearsome associates, while ignoring the truly great and benevolent.
पदच्छेदः
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| यन्मूले | यद्–मूल (७.१) | at whose root |
| निखिलागमान् | निखिल–आगम (२.३) | all the scriptures |
| उपदिशत् | उपदिशत् (उप√दिश्+शतृ, १.१) | teaching |
| तत्त्वम् | तत्त्व (२.१) | the principle |
| परम् | पर (२.१) | supreme |
| शाङ्करम् | शाङ्कर (२.१) | of Shankara |
| यत्पर्णे | यद्–पर्ण (७.१) | on whose leaf |
| जगताम् | जगत् (६.३) | of the worlds |
| निधिः | निधि (१.१) | the treasure (Vishnu) |
| सः | तद् (१.१) | that |
| तु | तु | but |
| वटः | वट (१.१) | Banyan tree |
| नाम्ना | नामन् (३.१) | by name |
| अपि | अपि | even |
| न | न | not |
| स्वीकृतः | स्वीकृत (स्वी√कृ+क्त, १.१) | is accepted/acknowledged |
| यच्छाखानिलयः | यद्–शाखा–निलय (१.१) | whose branches are the abode |
| पिशाचनिचयः | पिशाच–निचय (१.१) | of a multitude of ghosts |
| यन्मूलगाः | यद्–मूल–ग (√गम्, १.३) | whose roots are gone to by |
| पन्नगाः | पन्नग (१.३) | snakes |
| तस्य | तद् (६.१) | of that |
| अश्वत्थतरोः | अश्वत्थ–तरु (६.१) | Ashvattha tree |
| पुनः | पुनर् | on the other hand |
| कति | कति | how many |
| नमस्काराः | नमस्कार (१.३) | salutations |
| कति | कति | how many |
| प्रार्थनाः | प्रार्थना (१.३) | prayers |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | न्मू | ले | नि | खि | ला | ग | मा | नु | प | दि | श | त्त | त्त्वं | प | रं | शा | ङ्क | रं |
| य | त्प | र्णे | ज | ग | तां | नि | धिः | स | तु | व | टो | ना | म्ना | पि | न | स्वी | कृ | तः |
| य | च्छा | खा | नि | ल | यः | पि | शा | च | नि | च | यो | य | न्मू | ल | गाः | प | न्न | गा |
| स्त | स्या | श्व | त्थ | त | रोः | पु | नः | क | ति | न | म | स्का | राः | क | ति | प्रा | र्थ | नाः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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