जामाता कमलाक्ष एव गृहिणी गङ्गा जगत्पावनी
शीतांशुप्रमुखाः सुता भगवती श्रीरेव कन्या स्वयम् ।
ईदृक्ते गृहमेधिता त्रिभुवनाधारस्य वारान्निधे
कः शक्नोति जनो मनोरथपथेऽप्येतावदुत्प्रेक्षितुम् ॥
जामाता कमलाक्ष एव गृहिणी गङ्गा जगत्पावनी
शीतांशुप्रमुखाः सुता भगवती श्रीरेव कन्या स्वयम् ।
ईदृक्ते गृहमेधिता त्रिभुवनाधारस्य वारान्निधे
कः शक्नोति जनो मनोरथपथेऽप्येतावदुत्प्रेक्षितुम् ॥
शीतांशुप्रमुखाः सुता भगवती श्रीरेव कन्या स्वयम् ।
ईदृक्ते गृहमेधिता त्रिभुवनाधारस्य वारान्निधे
कः शक्नोति जनो मनोरथपथेऽप्येतावदुत्प्रेक्षितुम् ॥
अन्वयः
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(हे) वारान्निधे, ते जामाता कमलाक्षः एव, जगत्पावनी गङ्गा गृहिणी, शीतांशुप्रमुखाः सुताः, भगवती श्रीः स्वयम् एव कन्या । त्रिभुवनाधारस्य ते ईदृक् गृहमेधिता (अस्ति) । कः जनः मनोरथपथे अपि एतावत् उत्प्रेक्षितुम् शक्नोति?
Summary
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O Ocean, repository of waters and support of the three worlds! Your son-in-law is the lotus-eyed Vishnu, your wife is the world-purifying Ganga, your sons are the Moon and others, and the goddess Shri (Lakshmi) herself is your daughter. Who could even imagine such a magnificent household, even in their wildest dreams?
पदच्छेदः
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| जामाता | जामातृ (१.१) | son-in-law |
| कमलाक्षः | कमल–अक्षि (१.१) | the lotus-eyed one (Vishnu) |
| एव | एव | indeed |
| गृहिणी | गृहिणी (१.१) | wife |
| गङ्गा | गङ्गा (१.१) | Ganga |
| जगत्पावनी | जगत्–पावनी (√पू+णिच्+ङीप्, १.१) | the purifier of the world |
| शीतांशुप्रमुखाः | शीतांशु–प्रमुख (१.३) | headed by the cool-rayed one (the Moon) |
| सुताः | सुत (१.३) | sons |
| भगवती | भगवती (१.१) | the divine |
| श्रीः | श्री (१.१) | Shri (Lakshmi) |
| एव | एव | herself |
| कन्या | कन्या (१.१) | daughter |
| स्वयम् | स्वयम् | personally |
| ईदृक् | ईदृश् (१.१) | such |
| ते | युष्मद् (६.१) | your |
| गृहमेधिता | गृहमेधिता (१.१) | state of being a householder |
| त्रिभुवनाधारस्य | त्रिभुवन–आधार (६.१) | of the support of the three worlds |
| वारान्निधे | वार्–निधि (८.१) | O ocean (repository of waters) |
| कः | किम् (१.१) | who |
| शक्नोति | शक्नोति (√शक् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | is able |
| जनः | जन (१.१) | person |
| मनोरथपथे | मनोरथ–पथिन् (७.१) | in the path of desire |
| अपि | अपि | even |
| एतावत् | एतावत् (२.१) | this much |
| उत्प्रेक्षितुम् | उत्प्रेक्षितुम् (उत्+प्र√ईक्ष्+तुमुन्) | to imagine |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| जा | मा | ता | क | म | ला | क्ष | ए | व | गृ | हि | णी | ग | ङ्गा | ज | ग | त्पा | व | नी |
| शी | तां | शु | प्र | मु | खाः | सु | ता | भ | ग | व | ती | श्री | रे | व | क | न्या | स्व | यम् |
| ई | दृ | क्ते | गृ | ह | मे | धि | ता | त्रि | भु | व | ना | धा | र | स्य | वा | रा | न्नि | धे |
| कः | श | क्नो | ति | ज | नो | म | नो | र | थ | प | थे | ऽप्ये | ता | व | दु | त्प्रे | क्षि | तुम् |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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