अर्चामः सततं गणाधिपमथाप्याखून्निहन्मः शतं
ध्यायामो हृदि भैरवं तदपि तु प्रोत्सारयामः शुनः ।
भूतेशं प्रणुमस्तथापि शतशो भूतान्निगृह्णीमहे
न ह्येकस्य गुणः परस्य महतो दोषानपि प्रोणुते ॥
अर्चामः सततं गणाधिपमथाप्याखून्निहन्मः शतं
ध्यायामो हृदि भैरवं तदपि तु प्रोत्सारयामः शुनः ।
भूतेशं प्रणुमस्तथापि शतशो भूतान्निगृह्णीमहे
न ह्येकस्य गुणः परस्य महतो दोषानपि प्रोणुते ॥
ध्यायामो हृदि भैरवं तदपि तु प्रोत्सारयामः शुनः ।
भूतेशं प्रणुमस्तथापि शतशो भूतान्निगृह्णीमहे
न ह्येकस्य गुणः परस्य महतो दोषानपि प्रोणुते ॥
अन्वयः
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(वयम्) सततम् गणाधिपम् अर्चामः, अथ अपि शतम् आखून् निहन्मः । (वयम्) हृदि भैरवम् ध्यायामः, तत् अपि तु शुनः प्रोत्सारयामः । (वयम्) भूतेशम् प्रणुमः, तथापि शतशः भूतान् निगृह्णीमहे । हि एकस्य गुणः महतः परस्य दोषान् अपि न प्रोणुते ।
Summary
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We worship Ganapati, yet we kill hundreds of his mice. We meditate on Bhairava, but we drive away his dogs. We praise Bhutesha (Shiva), yet we torment hundreds of beings. Indeed, a good quality in one person does not cover up the faults of another great person associated with them, highlighting the hypocrisy of actions that contradict one's professed devotion.
पदच्छेदः
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| अर्चामः | अर्चामः (√अर्च कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. बहु.) | we worship |
| सततम् | सततम् | always |
| गणाधिपम् | गण–अधिप (२.१) | the lord of the Ganas (Ganapati) |
| अथ | अथ | and |
| अपि | अपि | also |
| आखून् | आखु (२.३) | mice |
| निहन्मः | निहन्मः (नि√हन् कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. बहु.) | we kill |
| शतम् | शतम् | a hundred |
| ध्यायामः | ध्यायामः (√ध्यै कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. बहु.) | we meditate on |
| हृदि | हृद् (७.१) | in the heart |
| भैरवम् | भैरव (२.१) | Bhairava |
| तत् | तद् (१.१) | that |
| अपि | अपि | even so |
| तु | तु | but |
| प्रोसारयामः | प्रोसारयामः (प्र+उत्√सृ +णिच् कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. बहु.) | we drive away |
| शुनः | श्वन् (२.३) | dogs |
| भूतेशम् | भूत–ईश (२.१) | the lord of beings (Shiva) |
| प्रणुमः | प्रणुमः (प्र√नु कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. बहु.) | we praise |
| तथापि | तथापि | yet |
| शतशः | शतशः | by the hundreds |
| भूतान् | भूत (२.३) | beings |
| निगृह्णीमहे | निगृह्णीमहे (नि√ग्रह् कर्तरि लट् (आत्मने.) उ.पु. बहु.) | we torment |
| न | न | not |
| हि | हि | for |
| एकस्य | एक (६.१) | of one |
| गुणः | गुण (१.१) | a virtue |
| परस्य | पर (६.१) | of another |
| महतः | महत् (६.१) | great one |
| दोषान् | दोष (२.३) | faults |
| अपि | अपि | even |
| प्रोणुते | प्रोणुते (प्र√ऊर्णु कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | does cover |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | र्चा | मः | स | त | तं | ग | णा | धि | प | म | था | प्या | खू | न्नि | ह | न्मः | श | तं |
| ध्या | या | मो | हृ | दि | भै | र | वं | त | द | पि | तु | प्रो | त्सा | र | या | मः | शु | नः |
| भू | ते | शं | प्र | णु | म | स्त | था | पि | श | त | शो | भू | ता | न्नि | गृ | ह्णी | म | हे |
| न | ह्ये | क | स्य | गु | णः | प | र | स्य | म | ह | तो | दो | षा | न | पि | प्रो | णु | ते |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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