कोणे क्वाप्यवतीर्य गात्रमभितः सिक्त्वा पयःशीकरै-
रास्वाद्योदकमागतोऽस्मि पुनरित्यास्ते गजस्याशये ।
कासारस्य दशा त्वसौ कलुषितान्यम्भांसि भग्नास्तटाः
प्रध्वस्ता नलिनी किमत्र बहुना खातव्यमास्ते पुनः ॥
कोणे क्वाप्यवतीर्य गात्रमभितः सिक्त्वा पयःशीकरै-
रास्वाद्योदकमागतोऽस्मि पुनरित्यास्ते गजस्याशये ।
कासारस्य दशा त्वसौ कलुषितान्यम्भांसि भग्नास्तटाः
प्रध्वस्ता नलिनी किमत्र बहुना खातव्यमास्ते पुनः ॥
रास्वाद्योदकमागतोऽस्मि पुनरित्यास्ते गजस्याशये ।
कासारस्य दशा त्वसौ कलुषितान्यम्भांसि भग्नास्तटाः
प्रध्वस्ता नलिनी किमत्र बहुना खातव्यमास्ते पुनः ॥
अन्वयः
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'क्वापि कोणे अवतीर्य, पयः-शीकरैः अभितः गात्रम् सिक्त्वा, उदकम् आस्वाद्य, पुनः आगतः अस्मि' इति गजस्य आशये आस्ते। तु कासारस्य दशा असौ - अम्भांसि कलुषितानि, तटाः भग्नाः, नलिनी प्रध्वस्ता। अत्र बहुना किम्? पुनः खातव्यम् आस्ते।
Summary
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In the elephant's mind, it thinks, "I have come again, having descended into a corner, sprinkled my body with water drops, and tasted the water." But this is the condition of the pond: the waters are muddied, the banks are broken, the lotus plant is destroyed. What more is there to say? It needs to be re-dug.
पदच्छेदः
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| कोणे | कोण (७.१) | in a corner |
| क्वापि | क्वापि | somewhere |
| अवतीर्य | अवतीर्य (अव√तॄ+ल्यप्) | having descended |
| गात्रम् | गात्र (२.१) | the body |
| अभितः | अभितस् | all around |
| सिक्त्वा | सिक्त्वा (√सिच्+क्त्वा) | having sprinkled |
| पयःशीकरैः | पयस्–शीकर (३.३) | with drops of water |
| आस्वाद्य | आस्वाद्य (आ√स्वाद्+ल्यप्) | having tasted |
| उदकम् | उदक (२.१) | the water |
| आगतः | आगत (आ√गम्+क्त, १.१) | have come |
| अस्मि | अस्मि (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | I |
| पुनः | पुनर् | again |
| इति | इति | thus |
| आस्ते | आस्ते (√आस् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is |
| गजस्य | गज (६.१) | the elephant's |
| आशये | आशय (७.१) | in the mind |
| कासारस्य | कासार (६.१) | of the pond |
| दशा | दशा (१.१) | condition |
| तु | तु | but |
| असौ | अदस् (१.१) | this |
| कलुषितानि | कलुषित (१.३) | muddied |
| अम्भांसि | अम्भस् (१.३) | the waters |
| भग्नाः | भग्न (√भञ्ज्+क्त, १.३) | broken |
| तटाः | तट (१.३) | the banks |
| प्रध्वस्ता | प्रध्वस्त (प्र√ध्वंस्+क्त, १.१) | destroyed |
| नलिनी | नलिनी (१.१) | the lotus plant |
| किम् | किम् (३.१) | what |
| अत्र | अत्र | here |
| बहुना | बहु (३.१) | with much (talk) |
| खातव्यम् | खातव्य (√खन्+तव्यत्, १.१) | needs to be dug |
| आस्ते | आस्ते (√आस् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | it |
| पुनः | पुनर् | again |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| को | णे | क्वा | प्य | व | ती | र्य | गा | त्र | म | भि | तः | सि | क्त्वा | प | यः | शी | क | रै |
| रा | स्वा | द्यो | द | क | मा | ग | तो | ऽस्मि | पु | न | रि | त्या | स्ते | ग | ज | स्या | श | ये |
| का | सा | र | स्य | द | शा | त्व | सौ | क | लु | षि | ता | न्य | म्भां | सि | भ | ग्ना | स्त | टाः |
| प्र | ध्व | स्ता | न | लि | नी | कि | म | त्र | ब | हु | ना | खा | त | व्य | मा | स्ते | पु | नः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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