स्थित्वा तीरभुवि प्रसार्य सरसि स्वैरं कराग्रं पयः
पातव्यं पिब तावता न विरमेद्दन्तीन्द्र किं ते तृषा ।
उन्मृद्नासि तटीरपः कलुषयस्युन्मूलयस्यब्जिनी-
हानिः कस्य तवैव मृग्यमुदकं भ्रातः पुनस्तृष्यतः ॥
स्थित्वा तीरभुवि प्रसार्य सरसि स्वैरं कराग्रं पयः
पातव्यं पिब तावता न विरमेद्दन्तीन्द्र किं ते तृषा ।
उन्मृद्नासि तटीरपः कलुषयस्युन्मूलयस्यब्जिनी-
हानिः कस्य तवैव मृग्यमुदकं भ्रातः पुनस्तृष्यतः ॥
पातव्यं पिब तावता न विरमेद्दन्तीन्द्र किं ते तृषा ।
उन्मृद्नासि तटीरपः कलुषयस्युन्मूलयस्यब्जिनी-
हानिः कस्य तवैव मृग्यमुदकं भ्रातः पुनस्तृष्यतः ॥
अन्वयः
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(हे) दन्ति-इन्द्र, तीरभुवि स्थित्वा, सरसि स्वैरम् कर-अग्रम् प्रसार्य, पयः पातव्यम्, पिब। ते तृषा तावता किम् न विरमेत्? (त्वम्) तटीः उन्मृद्नासि, अपः कलुषयसि, अब्जिनीम् उन्मूलयसि। हानिः कस्य? (हे) भ्रातः, पुनः तृष्यतः तव एव उदकम् मृग्यम् (भविष्यति)।
Summary
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O king of elephants, stand on the bank, extend the tip of your trunk into the lake, and drink the water that needs to be drunk. Why would your thirst not be quenched by just that? You destroy the banks, muddy the water, and uproot the lotuses. Whose loss is it? Brother, it is you who will have to search for water again when you are thirsty.
पदच्छेदः
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| स्थित्वा | स्थित्वा (√स्था+क्त्वा) | having stood |
| तीरभुवि | तीर–भू (७.१) | on the bank |
| प्रसार्य | प्रसार्य (प्र√सृ+णिच्+ल्यप्) | having extended |
| सरसि | सरस् (७.१) | into the lake |
| स्वैरम् | स्वैरम् | freely |
| कराग्रम् | कर–अग्र (२.१) | the tip of your trunk |
| पयः | पयस् (२.१) | water |
| पातव्यम् | पातव्य (√पा+तव्यत्, २.१) | is to be drunk |
| पिब | पिब (√पा कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | drink |
| तावता | तावत् (३.१) | by that much |
| न | न | not |
| विरमेत् | विरमेत् (वि√रम् कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | would cease |
| दन्तीन्द्र | दन्तिन्–इन्द्र (८.१) | O king of elephants |
| किम् | किम् (१.१) | why |
| ते | युष्मद् (६.१) | your |
| तृषा | तृष् (१.१) | thirst |
| उन्मृद्नासि | उन्मृद्नासि (उद्√मृद् कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you destroy |
| तटीः | तटी (२.३) | the banks |
| अपः | अप् (२.३) | the waters |
| कलुषयसि | कलुषयसि (√कलुषय कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you muddy |
| उन्मूलयसि | उन्मूलयसि (उद्√उन्मूलय कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you uproot |
| अब्जिनीम् | अब्जिनी (२.१) | the lotus plant |
| हानिः | हानि (१.१) | loss |
| कस्य | किम् (६.१) | whose |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| एव | एव | own |
| मृग्यम् | मृग्य (१.१) | to be sought |
| उदकम् | उदक (१.१) | water |
| भ्रातः | भ्रातृ (८.१) | O brother |
| पुनः | पुनर् | again |
| तृष्यतः | तृष्यत् (६.१) | when you are thirsty |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्थि | त्वा | ती | र | भु | वि | प्र | सा | र्य | स | र | सि | स्वै | रं | क | रा | ग्रं | प | यः |
| पा | त | व्यं | पि | ब | ता | व | ता | न | वि | र | मे | द्द | न्ती | न्द्र | किं | ते | तृ | षा |
| उ | न्मृ | द्ना | सि | त | टी | र | पः | क | लु | ष | य | स्यु | न्मू | ल | य | स्य | ब्जि | नी |
| हा | निः | क | स्य | त | वै | व | मृ | ग्य | मु | द | कं | भ्रा | तः | पु | न | स्तृ | ष्य | तः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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