अद्यारभ्य यदि प्रिये पुनरहं मानस्य वान्यस्य वा
गृह्णीयां शठदुर्नयेन मनसा नामापि संक्षेपतः ।
तत्तेनैव विना शशाङ्कधवलाः स्पष्टाट्टहासा निशा
एको वा दिवसः पयोदमलिनो यायान्मम प्रावृषि ॥
अद्यारभ्य यदि प्रिये पुनरहं मानस्य वान्यस्य वा
गृह्णीयां शठदुर्नयेन मनसा नामापि संक्षेपतः ।
तत्तेनैव विना शशाङ्कधवलाः स्पष्टाट्टहासा निशा
एको वा दिवसः पयोदमलिनो यायान्मम प्रावृषि ॥
गृह्णीयां शठदुर्नयेन मनसा नामापि संक्षेपतः ।
तत्तेनैव विना शशाङ्कधवलाः स्पष्टाट्टहासा निशा
एको वा दिवसः पयोदमलिनो यायान्मम प्रावृषि ॥
अन्वयः
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(हे) प्रिये, अद्य आरभ्य यदि अहम् शठ-दुर्नयेन मनसा मानस्य वा अन्यस्य वा नाम अपि संक्षेपतः पुनः गृह्णीयाम्, तत् मम शशाङ्क-धवलाः स्पष्ट-अट्टहासाः निशाः वा एकः पयोद-मलिनः दिवसः प्रावृषि तेन एव विना यायात्।
Summary
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A lover vows to his beloved: "O dear one, starting from today, if I, with a deceitful and wicked mind, ever again even briefly entertain the name of pride or any other such thing, then may my moon-white, brightly laughing nights, or a single cloud-dark day in the rainy season, pass without you."
पदच्छेदः
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| अद्य | अद्य | today |
| आरभ्य | आरभ्य (आ√रभ्+ल्यप्) | starting from |
| यदि | यदि | if |
| प्रिये | प्रिया (८.१) | O dear one |
| पुनः | पुनर् | again |
| अहम् | अस्मद् (१.१) | I |
| मानस्य | मान (६.१) | of pride |
| वा | वा | or |
| अन्यस्य | अन्य (६.१) | of another |
| वा | वा | or |
| गृह्णीयाम् | गृह्णीयाम् (√ग्रह् कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | should take |
| शठदुर्नयेन | शठ–दुर्नय (३.१) | with deceitful and wicked |
| मनसा | मनस् (३.१) | mind |
| नाम | नामन् (२.१) | the name |
| अपि | अपि | even |
| संक्षेपतः | संक्षेपतः | briefly |
| तत् | तत् | then |
| तेन | तद् (३.१) | him (you) |
| एव | एव | indeed |
| विना | विना | without |
| शशाङ्कधवलाः | शशाङ्क–धवल (१.३) | moon-white |
| स्पष्टाट्टहासाः | स्पष्ट–अट्टहास (१.३) | brightly laughing |
| निशाः | निशा (१.३) | nights |
| एकः | एक (१.१) | a single |
| वा | वा | or |
| दिवसः | दिवस (१.१) | day |
| पयोदमलिनः | पयोद–मलिन (१.१) | dark with clouds |
| यायात् | यायात् (√या कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | may it pass |
| मम | अस्मद् (६.१) | my |
| प्रावृषि | प्रावृष् (७.१) | in the rainy season |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | द्या | र | भ्य | य | दि | प्रि | ये | पु | न | र | हं | मा | न | स्य | वा | न्य | स्य | वा |
| गृ | ह्णी | यां | श | ठ | दु | र्न | ये | न | म | न | सा | ना | मा | पि | सं | क्षे | प | तः |
| त | त्ते | नै | व | वि | ना | श | शा | ङ्क | ध | व | लाः | स्प | ष्टा | ट्ट | हा | सा | नि | शा |
| ए | को | वा | दि | व | सः | प | यो | द | म | लि | नो | या | या | न्म | म | प्रा | वृ | षि |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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