इदं कृष्णं कृष्णं प्रियतम तनु श्वेतमथ किं
गमिष्यामो यामो भवतु गमनेनाथ भवतु ।
पुरा येनावं मे चिरमनुसृता चित्तपदवी
स एवान्यो जातः सखि परिचिताः कस्य पुरुषाः ॥
इदं कृष्णं कृष्णं प्रियतम तनु श्वेतमथ किं
गमिष्यामो यामो भवतु गमनेनाथ भवतु ।
पुरा येनावं मे चिरमनुसृता चित्तपदवी
स एवान्यो जातः सखि परिचिताः कस्य पुरुषाः ॥
गमिष्यामो यामो भवतु गमनेनाथ भवतु ।
पुरा येनावं मे चिरमनुसृता चित्तपदवी
स एवान्यो जातः सखि परिचिताः कस्य पुरुषाः ॥
अन्वयः
AI
(हे) प्रियतम, इदम् कृष्णम् कृष्णम्, तनु श्वेतम्। अथ किम्? गमिष्यामः? यामः। अथ गमनेन भवतु, भवतु। (हे) सखि, पुरा येन मे चित्त-पदवी चिरम् अनुसृता, सः एव अन्यः जातः। पुरुषाः कस्य परिचिताः (भवन्ति)?
Summary
AI
A woman speaks, possibly delirious: "This is dark, dark, my love... the body is white. What then? Shall we go? Let's go. Well, let it be with going, let it be. O friend, he who once followed the path of my heart for so long has now become someone else. To whom are men ever truly known?"
पदच्छेदः
AI
| इदम् | इदम् (१.१) | this |
| कृष्णम् | कृष्ण (१.१) | is dark |
| कृष्णम् | कृष्ण (१.१) | dark |
| प्रियतम | प्रियतम (८.१) | O beloved |
| तनु | तनु (१.१) | the body |
| श्वेतम् | श्वेत (१.१) | is white |
| अथ | अथ | what |
| किम् | किम् (१.१) | then |
| गमिष्यामः | गमिष्यामः (√गम् कर्तरि लृट् (परस्मै.) उ.पु. बहु.) | shall we go |
| यामः | यामः (√या कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. बहु.) | let's go |
| भवतु | भवतु (√भू कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | let it be |
| गमनेन | गमन (३.१) | with going |
| अथ | अथ | well |
| भवतु | भवतु (√भू कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | let it be |
| पुरा | पुरा | formerly |
| येन | यद् (३.१) | by whom |
| आवम् | अस्मद् (१.२) | we two |
| मे | अस्मद् (६.१) | my |
| चिरम् | चिरम् | for a long time |
| अनुसृता | अनुसृत (अनु√सृ+क्त, १.१) | was followed |
| चित्तपदवी | चित्त–पदवी (१.१) | the path of the heart |
| सः | तद् (१.१) | he |
| एव | एव | himself |
| अन्यः | अन्य (१.१) | another |
| जातः | जात (√जन्+क्त, १.१) | has become |
| सखि | सखि (८.१) | O friend |
| परिचिताः | परिचित (परि√चि+क्त, १.३) | truly known |
| कस्य | किम् (६.१) | to whom |
| पुरुषाः | पुरुष (१.३) | are men |
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | दं | कृ | ष्णं | कृ | ष्णं | प्रि | य | त | म | त | नु | श्वे | त | म | थ | किं |
| ग | मि | ष्या | मो | या | मो | भ | व | तु | ग | म | ने | ना | थ | भ | व | तु |
| पु | रा | ये | ना | वं | मे | चि | र | म | नु | सृ | ता | चि | त्त | प | द | वी |
| स | ए | वा | न्यो | जा | तः | स | खि | प | रि | चि | ताः | क | स्य | पु | रु | षाः |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.