सन्त्येवात्र गृहे गृहे युवतयस्ताः पृच्छ गत्वाधुना
प्रेयांसः प्रणमन्ति किं तव पुनर्दासो यथा वर्तते ।
आत्मद्रोहिणि दुर्जनैः प्रलपितं कर्णेऽनिशं मा कृथा-
श्छिन्नस्नेहरसा भवन्ति पुरुषा दुःखानुवर्त्याः पुनः ॥
सन्त्येवात्र गृहे गृहे युवतयस्ताः पृच्छ गत्वाधुना
प्रेयांसः प्रणमन्ति किं तव पुनर्दासो यथा वर्तते ।
आत्मद्रोहिणि दुर्जनैः प्रलपितं कर्णेऽनिशं मा कृथा-
श्छिन्नस्नेहरसा भवन्ति पुरुषा दुःखानुवर्त्याः पुनः ॥
प्रेयांसः प्रणमन्ति किं तव पुनर्दासो यथा वर्तते ।
आत्मद्रोहिणि दुर्जनैः प्रलपितं कर्णेऽनिशं मा कृथा-
श्छिन्नस्नेहरसा भवन्ति पुरुषा दुःखानुवर्त्याः पुनः ॥
अन्वयः
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अत्र गृहे गृहे युवतयः सन्ति एव। अधुना गत्वा ताः पृच्छ, किम् प्रेयांसः तव दासः यथा वर्तते (तथा) प्रणमन्ति? (हे) आत्म-द्रोहिणि, दुर्जनैः प्रलपितम् अनिशम् कर्णे मा कृथाः। पुरुषाः छिन्न-स्नेह-रसाः (सन्तः) पुनः दुःख-अनुवर्त्याः भवन्ति।
Summary
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A man pleads with his beloved: "There are young women in every house here; go now and ask them if their lovers bow to them as I, your slave, do. O self-tormentor, do not constantly listen to the chatter of wicked people. Men whose affection has been severed become difficult to win back."
पदच्छेदः
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| सन्ति | सन्ति (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | there are |
| एव | एव | indeed |
| अत्र | अत्र | here |
| गृहे | गृह (७.१) | in house |
| गृहे | गृह (७.१) | and house |
| युवतयः | युवति (१.३) | young women |
| ताः | तद् (२.३) | them |
| पृच्छ | पृच्छ (√प्रछ् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | ask |
| गत्वा | गत्वा (√गम्+क्त्वा) | having gone |
| अधुना | अधुना | now |
| प्रेयांसः | प्रेयस् (१.३) | lovers |
| प्रणमन्ति | प्रणमन्ति (प्र√नम् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | bow |
| किम् | किम् | whether |
| तव | युष्मद् (६.१) | your |
| पुनः | पुनर् | however |
| दासः | दास (१.१) | slave |
| यथा | यथा | as |
| वर्तते | वर्तते (√वृत् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | behaves |
| आत्मद्रोहिणि | आत्मन्–द्रोहिन् (८.१) | O self-tormentor |
| दुर्जनैः | दुर्जन (३.३) | by wicked people |
| प्रलपितम् | प्रलपित (प्र√लप्+क्त, २.१) | chatter |
| कर्णे | कर्ण (७.१) | in the ear |
| अनिशम् | अनिशम् | constantly |
| मा | मा | do not |
| कृथाः | कृथाः (√कृ कर्तरि लुङ् (परस्मै.) म.पु. एक.) | do |
| छिन्नस्नेहरसाः | छिन्न–स्नेह–रस (१.३) | those whose affection has been severed |
| भवन्ति | भवन्ति (√भू कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | become |
| पुरुषाः | पुरुष (१.३) | men |
| दुःखानुवर्त्याः | दुःख–अनुवर्त्य (१.३) | difficult to win back |
| पुनः | पुनर् | again |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | न्त्ये | वा | त्र | गृ | हे | गृ | हे | यु | व | त | य | स्ताः | पृ | च्छ | ग | त्वा | धु | ना |
| प्रे | यां | सः | प्र | ण | म | न्ति | किं | त | व | पु | न | र्दा | सो | य | था | व | र्त | ते |
| आ | त्म | द्रो | हि | णि | दु | र्ज | नैः | प्र | ल | पि | तं | क | र्णे | ऽनि | शं | मा | कृ | था |
| श्छि | न्न | स्ने | ह | र | सा | भ | व | न्ति | पु | रु | षा | दुः | खा | नु | व | र्त्याः | पु | नः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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