देशैरन्तरिता शतैश्च सरितामुर्वीभृतां काननै-
र्यत्नेनापि न याति लोचनपथं कान्तेति जानन्नपि ।
उद्ग्रीवश्चरणार्धरुद्धवसुधः कृत्वाश्रुपूर्णां दृशं
तामाशां पथिकस्तथापि किमपि ध्यायंश्चिरं वीक्षते ॥
देशैरन्तरिता शतैश्च सरितामुर्वीभृतां काननै-
र्यत्नेनापि न याति लोचनपथं कान्तेति जानन्नपि ।
उद्ग्रीवश्चरणार्धरुद्धवसुधः कृत्वाश्रुपूर्णां दृशं
तामाशां पथिकस्तथापि किमपि ध्यायंश्चिरं वीक्षते ॥
र्यत्नेनापि न याति लोचनपथं कान्तेति जानन्नपि ।
उद्ग्रीवश्चरणार्धरुद्धवसुधः कृत्वाश्रुपूर्णां दृशं
तामाशां पथिकस्तथापि किमपि ध्यायंश्चिरं वीक्षते ॥
अन्वयः
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कान्ता शतैः देशैः सरिताम् उर्वीभृताम् काननैः च अन्तरिता, यत्नेन अपि लोचन-पथम् न याति इति जानन् अपि, पथिकः तथापि उद्ग्रीवः चरण-अर्ध-रुद्ध-वसुधः (सन्) दृशम् अश्रु-पूर्णां कृत्वा, किम् अपि ध्यायन् च ताम् आशाम् चिरम् वीक्षते।
Summary
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Although the traveler knows that his beloved is separated from him by hundreds of lands, rivers, mountains, and forests, and that she will not come into his line of sight even with effort, he still cranes his neck, stands on tiptoe, fills his eyes with tears, and, thinking of something, gazes for a long time in her direction.
पदच्छेदः
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| देशैः | देश (३.३) | by lands |
| अन्तरिता | अन्तरित (१.१) | is separated |
| शतैः | शत (३.३) | by hundreds |
| च | च | and |
| सरिताम् | सरित् (३.३) | by rivers |
| उर्वीभृताम् | उर्वीभृत् (३.३) | by mountains |
| काननैः | कानन (३.३) | by forests |
| यत्नेन | यत्न (३.१) | with effort |
| अपि | अपि | even |
| न | न | not |
| याति | याति (√या कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | she comes |
| लोचनपथम् | लोचन–पथ (२.१) | into the path of sight |
| कान्ता | कान्ता (१.१) | the beloved |
| इति | इति | thus |
| जानन् | जानत् (√ज्ञा+शतृ, १.१) | knowing |
| अपि | अपि | although |
| उद्ग्रीवः | उद्ग्रीव (१.१) | with neck craned |
| चरणार्धरुद्धवसुधः | चरण–अर्ध–रुद्ध–वसुधा (१.१) | standing on tiptoe |
| कृत्वा | कृत्वा (√कृ+क्त्वा) | having made |
| अश्रुपूर्णां | अश्रु–पूर्ण (२.१) | filled with tears |
| दृशम् | दृश् (२.१) | his gaze |
| ताम् | तद् (२.१) | that |
| आशाम् | आशा (२.१) | direction |
| पथिकः | पथिक (१.१) | the traveler |
| तथापि | तथापि | still |
| किम् | किम् (२.१) | something |
| अपि | अपि | or other |
| ध्यायन् | ध्यायत् (√ध्यै+शतृ, १.१) | thinking |
| च | च | and |
| चिरम् | चिरम् | for a long time |
| वीक्षते | वीक्षते (वि√ईक्ष् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | gazes |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| दे | शै | र | न्त | रि | ता | श | तै | श्च | स | रि | ता | मु | र्वी | भृ | तां | का | न | नै |
| र्य | त्ने | ना | पि | न | या | ति | लो | च | न | प | थं | का | न्ते | ति | जा | न | न्न | पि |
| उ | द्ग्री | व | श्च | र | णा | र्ध | रु | द्ध | व | सु | धः | कृ | त्वा | श्रु | पू | र्णां | दृ | शं |
| ता | मा | शां | प | थि | क | स्त | था | पि | कि | म | पि | ध्या | यं | श्चि | रं | वी | क्ष | ते |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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