भ्रूभेदो रचितः चिरं नयनयोरभ्यस्तमामीलनं
रोद्धुं शिक्षितमादरेण हसितं मौनेऽभियोगः कृतः ।
धैर्यं कर्तुमपि स्थिरीकृतमिदं चेतः कथंचिन्मया
बद्धो मानपरिग्रहे परिकरः सिद्धिस्तु दैवस्थिता ॥
भ्रूभेदो रचितः चिरं नयनयोरभ्यस्तमामीलनं
रोद्धुं शिक्षितमादरेण हसितं मौनेऽभियोगः कृतः ।
धैर्यं कर्तुमपि स्थिरीकृतमिदं चेतः कथंचिन्मया
बद्धो मानपरिग्रहे परिकरः सिद्धिस्तु दैवस्थिता ॥
रोद्धुं शिक्षितमादरेण हसितं मौनेऽभियोगः कृतः ।
धैर्यं कर्तुमपि स्थिरीकृतमिदं चेतः कथंचिन्मया
बद्धो मानपरिग्रहे परिकरः सिद्धिस्तु दैवस्थिता ॥
अन्वयः
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मया भ्रू-भेदः रचितः, चिरम् नयनयोः आमीलनम् अभ्यस्तम्, हसितम् आदरेण रोद्धुम् शिक्षितम्, मौने अभियोगः कृतः, धैर्यम् कर्तुम् अपि इदम् चेतः कथञ्चित् स्थिरी-कृतम्। मान-परिग्रहे परिकरः बद्धः, सिद्धिः तु दैव-स्थिता।
Summary
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A woman resolves to show anger: "I have practiced knitting my brows, I have rehearsed closing my eyes for a long time, I have carefully learned to suppress my laughter, and I have made an effort to remain silent. I have somehow steadied my heart to be brave. I have girded my loins to maintain my pride, but success now rests with fate."
पदच्छेदः
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| भ्रूभेदः | भ्रू–भेद (१.१) | knitting of the brows |
| रचितः | रचित (√रच्+क्त, १.१) | was practiced |
| चिरम् | चिरम् | for a long time |
| नयनयोः | नयन (६.२) | of the eyes |
| अभ्यस्तम् | अभ्यस्त (अभि√अस्+क्त, १.१) | was rehearsed |
| आमीलनम् | आमीलन (१.१) | closing |
| रोद्धुम् | रोद्धुम् (√रुध्+तुमुन्) | to suppress |
| शिक्षितम् | शिक्षित (√शिक्ष्+क्त, १.१) | was learned |
| आदरेण | आदर (३.१) | carefully |
| हसितम् | हसित (१.१) | laughter |
| मौने | मौन (७.१) | in silence |
| अभियोगः | अभियोग (१.१) | effort |
| कृतः | कृत (√कृ+क्त, १.१) | was made |
| धैर्यम् | धैर्य (२.१) | bravery |
| कर्तुम् | कर्तुम् (√कृ+तुमुन्) | to do |
| अपि | अपि | also |
| स्थिरीकृतम् | स्थिरीकृत (१.१) | was steadied |
| इदम् | इदम् (१.१) | this |
| चेतः | चेतस् (१.१) | heart |
| कथंचित् | कथंचित् | somehow |
| मया | अस्मद् (३.१) | by me |
| बद्धः | बद्ध (√बन्ध्+क्त, १.१) | is girded |
| मानपरिग्रहे | मान–परिग्रह (७.१) | in maintaining pride |
| परिकरः | परिकर (१.१) | loins (resolve) |
| सिद्धिः | सिद्धि (१.१) | success |
| तु | तु | but |
| दैवस्थिता | दैव–स्थित (१.१) | rests with fate |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| भ्रू | भे | दो | र | चि | तः | चि | रं | न | य | न | यो | र | भ्य | स्त | मा | मी | ल | नं |
| रो | द्धुं | शि | क्षि | त | मा | द | रे | ण | ह | सि | तं | मौ | ने | ऽभि | यो | गः | कृ | तः |
| धै | र्यं | क | र्तु | म | पि | स्थि | री | कृ | त | मि | दं | चे | तः | क | थं | चि | न्म | या |
| ब | द्धो | मा | न | प | रि | ग्र | हे | प | रि | क | रः | सि | द्धि | स्तु | दै | व | स्थि | ता |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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