तन्वङ्ग्या गुरुसन्निधौ नयनजं यद्वारि संस्तम्भितं
तेनान्तर्गलितेन मन्मथशिखी सिक्तोऽनुषङ्गोद्भवः ।
मन्ये तस्य निरस्यमानकिरणस्यैषा मुखेनोद्गता
श्वासामोदसमाकुलालिनिकरव्याजेन धूमावलिः ॥
तन्वङ्ग्या गुरुसन्निधौ नयनजं यद्वारि संस्तम्भितं
तेनान्तर्गलितेन मन्मथशिखी सिक्तोऽनुषङ्गोद्भवः ।
मन्ये तस्य निरस्यमानकिरणस्यैषा मुखेनोद्गता
श्वासामोदसमाकुलालिनिकरव्याजेन धूमावलिः ॥
तेनान्तर्गलितेन मन्मथशिखी सिक्तोऽनुषङ्गोद्भवः ।
मन्ये तस्य निरस्यमानकिरणस्यैषा मुखेनोद्गता
श्वासामोदसमाकुलालिनिकरव्याजेन धूमावलिः ॥
अन्वयः
AI
गुरु-सन्निधौ तन्वङ्ग्या यत् नयन-जम् वारि संस्तम्भितम्, तेन अन्तर्-गलितेन अनुषङ्ग-उद्भवः मन्मथ-शिखी सिक्तः। मन्ये, निरस्यमान-किरणस्य तस्य एषा धूम-आवलिः श्वास-आमोद-समाकुल-अलि-निकर-व्याजेन मुखेन उद्गता।
Summary
AI
The tears that the slender woman suppressed in the presence of her elders trickled inward, fanning the fire of love born from attachment. I think that the smoke-plume of this fire, whose flames are being suppressed, is now emerging from her mouth under the guise of a swarm of bees, drawn by the fragrance of her sighs.
पदच्छेदः
AI
| तन्वङ्ग्या | तन्वङ्गी (३.१) | by the slender woman |
| गुरुसन्निधौ | गुरु–सन्निधि (७.१) | in the presence of elders |
| नयनजम् | नयन–ज (२.१) | eye-born |
| यत् | यद् (२.१) | which |
| वारि | वारि (२.१) | water (tears) |
| संस्तम्भितम् | संस्तम्भित (सम्√स्तम्भ्+क्त, १.१) | was suppressed |
| तेन | तद् (३.१) | by that |
| अन्तर्गलितेन | अन्तर्–गलित (३.१) | inwardly trickled |
| मन्मथशिखी | मन्मथ–शिखिन् (१.१) | the fire of love |
| सिक्तः | सिक्त (√सिच्+क्त, १.१) | was sprinkled (fanned) |
| अनुषङ्गोद्भवः | अनुषङ्ग–उद्भव (१.१) | born from attachment |
| मन्ये | मन्ये (√मन् कर्तरि लट् (आत्मने.) उ.पु. एक.) | I think |
| तस्य | तद् (६.१) | of that |
| निरस्यमानकिरणस्य | निरस्यमान (निर्√अस्+यक्+शानच्)–किरण (६.१) | whose rays are being suppressed |
| एषा | एतद् (१.१) | this |
| मुखेन | मुख (३.१) | from the mouth |
| उद्गता | उद्गत (उद्√गम्+क्त, १.१) | has emerged |
| श्वासामोदसमाकुलालिनिकरव्याजेन | श्वास–आमोद–समाकुल–अलि–निकर–व्याज (३.१) | under the guise of a swarm of bees drawn by the fragrance of her sighs |
| धूमावलिः | धूम–आवलि (१.१) | a plume of smoke |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | न्व | ङ्ग्या | गु | रु | स | न्नि | धौ | न | य | न | जं | य | द्वा | रि | सं | स्त | म्भि | तं |
| ते | ना | न्त | र्ग | लि | ते | न | म | न्म | थ | शि | खी | सि | क्तो | ऽनु | ष | ङ्गो | द्भ | वः |
| म | न्ये | त | स्य | नि | र | स्य | मा | न | कि | र | ण | स्यै | षा | मु | खे | नो | द्ग | ता |
| श्वा | सा | मो | द | स | मा | कु | ला | लि | नि | क | र | व्या | जे | न | धू | मा | व | लिः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.