चिन्तामोहविनिश्चलेन मनसा मौनेन पादानतः
प्रत्याख्यानपराङ्मुखः प्रियतमो गन्तुं प्रवृत्तोऽधुना ।
सव्रीडैर् अलसैर्निरन्तरलुठद्बाष्पाकुलैर्लोचनैः
श्वासोत्कम्पकुचं निरीक्ष्य सुचिरं जीवाशया वारितः ॥
चिन्तामोहविनिश्चलेन मनसा मौनेन पादानतः
प्रत्याख्यानपराङ्मुखः प्रियतमो गन्तुं प्रवृत्तोऽधुना ।
सव्रीडैर् अलसैर्निरन्तरलुठद्बाष्पाकुलैर्लोचनैः
श्वासोत्कम्पकुचं निरीक्ष्य सुचिरं जीवाशया वारितः ॥
प्रत्याख्यानपराङ्मुखः प्रियतमो गन्तुं प्रवृत्तोऽधुना ।
सव्रीडैर् अलसैर्निरन्तरलुठद्बाष्पाकुलैर्लोचनैः
श्वासोत्कम्पकुचं निरीक्ष्य सुचिरं जीवाशया वारितः ॥
अन्वयः
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चिन्ता-मोह-विनिश्चलेन मनसा मौनेन पादानतः प्रियतमः प्रत्याख्यान-पराङ्मुखः (सन्) अधुना गन्तुम् प्रवृत्तः। (सः) स-व्रीडैः अलसैः निरन्तर-लुठत्-बाष्प-आकुलैः लोचनैः श्वास-उत्कम्प-कुचम् (यथा स्यात् तथा) सुचिरम् निरीक्ष्य जीवाशया वारितः।
Summary
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Her beloved, having bowed at her feet in silence with a mind stilled by anxious delusion and now averse to being rejected again, is about to leave. But he is stopped by her hope for life, as she gazes at him for a long time with shy, languid eyes filled with incessantly rolling tears, her breasts trembling with her sighs.
पदच्छेदः
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| चिन्तामोहविनिश्चलेन | चिन्ता–मोह–विनिश्चल (३.१) | with a mind stilled by anxious delusion |
| मनसा | मनस् (३.१) | with the mind |
| मौनेन | मौन (३.१) | with silence |
| पादानतः | पाद–आनत (१.१) | bowed at the feet |
| प्रत्याख्यानपराङ्मुखः | प्रत्याख्यान–पराङ्मुख (१.१) | averse to rejection |
| प्रियतमः | प्रियतम (१.१) | the beloved |
| गन्तुम् | गन्तुम् (√गम्+तुमुन्) | to go |
| प्रवृत्तः | प्रवृत्त (प्र√वृत्+क्त, १.१) | was inclined |
| अधुना | अधुना | now |
| सव्रीडैः | स–व्रीड (३.३) | with shy |
| अलसैः | अलस (३.३) | languid |
| निरन्तरलुठद्बाष्पाकुलैः | निरन्तर–लुठत्–बाष्प–आकुल (३.३) | filled with incessantly rolling tears |
| लोचनैः | लोचन (३.३) | with eyes |
| श्वासोत्कम्पकुचम् | श्वास–उत्कम्प–कुच (२.१) | her breasts trembling with sighs |
| निरीक्ष्य | निरीक्ष्य (नि√ईक्ष्+ल्यप्) | having gazed at |
| सुचिरम् | सुचिरम् | for a long time |
| जीवाशया | जीव–आशा (३.१) | by the hope for life |
| वारितः | वारित (√वृ+क्त, १.१) | was stopped |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| चि | न्ता | मो | ह | वि | नि | श्च | ले | न | म | न | सा | मौ | ने | न | पा | दा | न | तः |
| प्र | त्या | ख्या | न | प | रा | ङ्मु | खः | प्रि | य | त | मो | ग | न्तुं | प्र | वृ | त्तो | ऽधु | ना |
| स | व्री | डै | र | ल | सै | र्नि | र | न्त | र | लु | ठ | द्बा | ष्पा | कु | लै | र्लो | च | नैः |
| श्वा | सो | त्क | म्प | कु | चं | नि | री | क्ष्य | सु | चि | रं | जी | वा | श | या | वा | रि | तः |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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