मलयमरुतां वाता याता विकासितमल्लिका-
परिमलभरो भग्नो ग्रीष्मस्त्वमुत्सहसे यदि ।
घन घटयितुं निःस्नेहं त्वां य एव निवर्तने
प्रभवति गवां किं नश्छिन्नं स एव धनञ्जयः ॥
मलयमरुतां वाता याता विकासितमल्लिका-
परिमलभरो भग्नो ग्रीष्मस्त्वमुत्सहसे यदि ।
घन घटयितुं निःस्नेहं त्वां य एव निवर्तने
प्रभवति गवां किं नश्छिन्नं स एव धनञ्जयः ॥
परिमलभरो भग्नो ग्रीष्मस्त्वमुत्सहसे यदि ।
घन घटयितुं निःस्नेहं त्वां य एव निवर्तने
प्रभवति गवां किं नश्छिन्नं स एव धनञ्जयः ॥
अन्वयः
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मलय-मरुताम् वाताः याताः, विकासित-मल्लिका-परिमल-भरः (अस्ति), ग्रीष्मः भग्नः। (हे) घन, यदि त्वम् उत्सहसे, (तर्हि) निःस्नेहम् त्वाम् घटयितुम् (गच्छ)। यः एव गवाम् निवर्तने प्रभवति, सः एव धनञ्जयः। नः किम् छिन्नम्?
Summary
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A message to a cloud: "The Malaya winds have passed, the air is full of the fragrance of blossomed jasmine, and summer is over. O cloud, if you are eager, then go to unite with that loveless one. He who is capable of bringing back the cows (senses/sun-rays) is the true Dhananjaya (conqueror of wealth). What is lost to us?"
पदच्छेदः
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| मलयमरुताम् | मलय–मरुत् (६.३) | of the Malaya winds |
| वाताः | वात (१.३) | the breezes |
| याताः | यात (√या+क्त, १.३) | have gone |
| विकासितमल्लिकापरिमलभरो | विकासित–मल्लिका–परिमल–भर (१.१) | the abundance of fragrance from blossomed jasmine |
| भग्नः | भग्न (√भञ्ज्+क्त, १.१) | is broken (over) |
| ग्रीष्मः | ग्रीष्म (१.१) | summer |
| त्वम् | युष्मद् (१.१) | you |
| उत्सहसे | उत्सहसे (उद्√सह् कर्तरि लट् (आत्मने.) म.पु. एक.) | are eager |
| यदि | यदि | if |
| घन | घन (८.१) | O cloud |
| घटयितुम् | घटयितुम् (√घट्+णिच्+तुमुन्) | to unite |
| निःस्नेहम् | निःस्नेह (२.१) | the loveless one |
| त्वाम् | युष्मद् (२.१) | you |
| यः | यद् (१.१) | he who |
| एव | एव | indeed |
| निवर्तने | निवर्तन (७.१) | in bringing back |
| प्रभवति | प्रभवति (प्र√भू कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | is capable |
| गवाम् | गो (६.३) | of the cows (or senses/sun-rays) |
| किम् | किम् (१.१) | what |
| नः | अस्मद् (६.३) | of us |
| छिन्नम् | छिन्न (√छिद्+क्त, १.१) | is lost |
| सः | तद् (१.१) | he |
| एव | एव | alone |
| धनञ्जयः | धनञ्जय (१.१) | is Dhananjaya (Arjuna/fire) |
छन्दः
हरिणी [१७: नसमरसलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | ल | य | म | रु | तां | वा | ता | या | ता | वि | का | सि | त | म | ल्लि | का |
| प | रि | म | ल | भ | रो | भ | ग्नो | ग्री | ष्म | स्त्व | मु | त्स | ह | से | य | दि |
| घ | न | घ | ट | यि | तुं | निः | स्ने | हं | त्वां | य | ए | व | नि | व | र्त | ने |
| प्र | भ | व | ति | ग | वां | किं | न | श्छि | न्नं | स | ए | व | ध | न | ञ्ज | यः |
| न | स | म | र | स | ल | ग | ||||||||||
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