आलम्ब्याङ्गणवाटिकापरिसरे चूतद्रुमे मञ्जरीं
सर्पत्सान्द्रपरागलम्पटरणद्भृङ्गाङ्गनाशोभिनीम् ।
मन्ये स्वां तनुमुत्तरीयशकलेनाच्छाद्य बाला स्फुर-
त्कण्ठध्वाननिरोधकम्पितकुचश्वासोद्गमा रोदिति ॥
आलम्ब्याङ्गणवाटिकापरिसरे चूतद्रुमे मञ्जरीं
सर्पत्सान्द्रपरागलम्पटरणद्भृङ्गाङ्गनाशोभिनीम् ।
मन्ये स्वां तनुमुत्तरीयशकलेनाच्छाद्य बाला स्फुर-
त्कण्ठध्वाननिरोधकम्पितकुचश्वासोद्गमा रोदिति ॥
सर्पत्सान्द्रपरागलम्पटरणद्भृङ्गाङ्गनाशोभिनीम् ।
मन्ये स्वां तनुमुत्तरीयशकलेनाच्छाद्य बाला स्फुर-
त्कण्ठध्वाननिरोधकम्पितकुचश्वासोद्गमा रोदिति ॥
अन्वयः
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(अहम्) मन्ये, बाला अङ्गणवाटिकापरिसरे चूतद्रुमे सर्पत्सान्द्रपरागलम्पटरणद्भृङ्गाङ्गनाशोभिनीम् मञ्जरीम् आलम्ब्य, उत्तरीयशकलेन स्वाम् तनुम् आच्छाद्य, स्फुरत्कण्ठध्वाननिरोधकम्पितकुचश्वासोद्गमा (सती) रोदिति।
Summary
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I imagine a young woman weeping in the courtyard garden, leaning on a mango blossom cluster that is beautiful with humming female bees greedy for the thick pollen. She covers her body with a piece of her upper garment and cries, her breasts trembling and her breath heaving as she suppresses the sound of her sobbing.
पदच्छेदः
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| आलम्ब्य | आलम्ब्य (आ√लम्ब्+ल्यप्) | leaning on |
| अङ्गणवाटिकापरिसरे | अङ्गण–वाटिका–परिसर (७.१) | in the vicinity of the courtyard garden |
| चूतद्रुमे | चूत–द्रुम (७.१) | on the mango tree |
| मञ्जरीम् | मञ्जरी (२.१) | a flower cluster |
| सर्पत्सान्द्रपरागलम्पटरणद्भृङ्गाङ्गनाशोभिनीम् | सर्पत् (√सृप्+शतृ)–सान्द्र–पराग–लम्पट–रणत् (√रण्+शतृ)–भृङ्ग–अङ्गना–शोभिन् (२.१) | which is beautiful with humming female bees greedy for the thick, spreading pollen |
| मन्ये | मन्ये (√मन् कर्तरि लट् (आत्मने.) उ.पु. एक.) | I think |
| स्वाम् | स्व (२.१) | her own |
| तनुम् | तनु (२.१) | body |
| उत्तरीयशकलेन | उत्तरीय–शकल (३.१) | with a piece of her upper garment |
| आच्छाद्य | आच्छाद्य (आ√छद्+ल्यप्) | having covered |
| बाला | बाला (१.१) | the young woman |
| स्फुरत्कण्ठध्वाननिरोधकम्पितकुचश्वासोद्गमा | स्फुरत् (√स्फुर्+शतृ)–कण्ठ–ध्वान–निरोध (नि√रुध्)–कम्पित (√कम्प्+क्त)–कुच–श्वास–उद्गम (उद्√गम्, १.१) | whose breasts tremble and breath heaves from suppressing the sound of her sobbing |
| रोदिति | रोदिति (√रुद् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | cries |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | ल | म्ब्या | ङ्ग | ण | वा | टि | का | प | रि | स | रे | चू | त | द्रु | मे | म | ञ्ज | रीं |
| स | र्प | त्सा | न्द्र | प | रा | ग | ल | म्प | ट | र | ण | द्भृ | ङ्गा | ङ्ग | ना | शो | भि | नीम् |
| म | न्ये | स्वां | त | नु | मु | त्त | री | य | श | क | ले | ना | च्छा | द्य | बा | ला | स्फु | र |
| त्क | ण्ठ | ध्वा | न | नि | रो | ध | क | म्पि | त | कु | च | श्वा | सो | द्ग | मा | रो | दि | ति |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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