आयाते दयिते मनोरथशतैर्नीत्वा कथंचिद्दिनं
वैदग्ध्यापगमाज्जडे परिजने दीर्घां कथां कुर्वति ।
दष्टास्मीत्यभिधाय सत्वरपदं व्याधूय चीनांशुकं
तन्वङ्ग्या रतिकातरेण मनसा नीतः प्रदीपः शमम् ॥
आयाते दयिते मनोरथशतैर्नीत्वा कथंचिद्दिनं
वैदग्ध्यापगमाज्जडे परिजने दीर्घां कथां कुर्वति ।
दष्टास्मीत्यभिधाय सत्वरपदं व्याधूय चीनांशुकं
तन्वङ्ग्या रतिकातरेण मनसा नीतः प्रदीपः शमम् ॥
वैदग्ध्यापगमाज्जडे परिजने दीर्घां कथां कुर्वति ।
दष्टास्मीत्यभिधाय सत्वरपदं व्याधूय चीनांशुकं
तन्वङ्ग्या रतिकातरेण मनसा नीतः प्रदीपः शमम् ॥
अन्वयः
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दयिते आयाते (सति), मनोरथ-शतैः कथञ्चित् दिनं नीत्वा, वैदग्ध्य-अपगमात् जडे परिजने दीर्घाम् कथाम् कुर्वति (सति), तन्वङ्ग्या "दष्टा अस्मि" इति अभिधाय, सत्वर-पदं चीन-अंशुकं वि-आधूय, रति-कातरेण मनसा प्रदीपः शमं नीतः।
Summary
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Her beloved having arrived, she passed the day with a hundred longings. As her dull-witted attendant droned on with a long story, the slender woman, her mind eager for love, exclaimed, "I've been bitten!" and, in the pretext of shaking her silk garment, she extinguished the lamp.
पदच्छेदः
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| आयाते | आयात (आ√या+क्त, ७.१) | When he had arrived, |
| दयिते | दयित (७.१) | her beloved, |
| मनोरथशतैः | मनोरथ–शत (३.३) | with hundreds of longings, |
| नीत्वा | नीत्वा (√नी+क्त्वा) | having passed |
| कथंचिद् | कथञ्चित् | somehow |
| दिनं | दिन (२.१) | the day, |
| वैदग्ध्यापगमात् | वैदग्ध्य–अपगम (५.१) | due to a lack of cleverness, |
| जडे | जड (७.१) | when the dull |
| परिजने | परिजन (७.१) | attendant |
| दीर्घाम् | दीर्घा (२.१) | a long |
| कथाम् | कथा (२.१) | story |
| कुर्वति | कुर्वत् (√कृ+शतृ, ७.१) | was telling, |
| दष्टा | दष्ट (√दंश्+क्त, १.१) | Bitten |
| अस्मि | अस्मि (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | I am, |
| इति | इति | thus |
| अभिधाय | अभिधाय (अभि√धा+ल्यप्) | exclaiming, |
| सत्वरपदं | सत्वर–पदम् (२.१) | with quick steps, |
| व्याधूय | व्याधूय (वि+आ√धू+ल्यप्) | shaking |
| चीनांशुकं | चीन–अंशुक (२.१) | her silk garment, |
| तन्वङ्ग्या | तन्वङ्गी (३.१) | by the slender-limbed woman, |
| रतिकातरेण | रति–कातर (३.१) | eager for love, |
| मनसा | मनस् (३.१) | with a mind |
| नीतः | नीत (√नी+क्त, १.१) | was led |
| प्रदीपः | प्रदीप (१.१) | the lamp |
| शमम् | शम (२.१) | to extinction. |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | या | ते | द | यि | ते | म | नो | र | थ | श | तै | र्नी | त्वा | क | थं | चि | द्दि | नं |
| वै | द | ग्ध्या | प | ग | मा | ज्ज | डे | प | रि | ज | ने | दी | र्घां | क | थां | कु | र्व | ति |
| द | ष्टा | स्मी | त्य | भि | धा | य | स | त्व | र | प | दं | व्या | धू | य | ची | नां | शु | कं |
| त | न्व | ङ्ग्या | र | ति | का | त | रे | ण | म | न | सा | नी | तः | प्र | दी | पः | श | मम् |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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