गाढाश्लेषविशीर्णचन्दनरजःपुञ्जप्रकर्षादियं
शय्या सम्प्रति कोमलाङ्गि परुषेत्यारोप्य मां वक्षसि ।
गाढौष्ठग्रहपूर्वमाकुलतया पादाग्रसंदंशके-
नाकृष्याम्बरमात्मनो यदुचितं धूर्तेन तत्प्रस्तुतम् ॥
गाढाश्लेषविशीर्णचन्दनरजःपुञ्जप्रकर्षादियं
शय्या सम्प्रति कोमलाङ्गि परुषेत्यारोप्य मां वक्षसि ।
गाढौष्ठग्रहपूर्वमाकुलतया पादाग्रसंदंशके-
नाकृष्याम्बरमात्मनो यदुचितं धूर्तेन तत्प्रस्तुतम् ॥
शय्या सम्प्रति कोमलाङ्गि परुषेत्यारोप्य मां वक्षसि ।
गाढौष्ठग्रहपूर्वमाकुलतया पादाग्रसंदंशके-
नाकृष्याम्बरमात्मनो यदुचितं धूर्तेन तत्प्रस्तुतम् ॥
अन्वयः
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कोमल-अङ्गि! "इयं शय्या गाढ-आश्लेष-विशीर्ण-चन्दन-रजः-पुञ्ज-प्रकर्षात् सम्प्रति परुषा (जाता)" इति (उक्त्वा), मां वक्षसि आरोप्य, गाढ-ओष्ठ-ग्रह-पूर्वम् आकुलतया पाद-अग्र-संदंशकेन आत्मनः अम्बरम् आकृष्य, धूर्तेन यत् उचितं तत् प्रस्तुतम्।
Summary
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"O tender-limbed one," said the rogue, "this bed has become rough from the sandalwood powder scattered by our embraces." Placing me on his chest, he gave me a firm kiss, eagerly pulled off my garment with his toes, and then began to do what was appropriate for the moment.
पदच्छेदः
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| गाढाश्लेषविशीर्णचन्दनरजःपुञ्जप्रकर्षात् | गाढ–आश्लेष–विशीर्ण (वि√विशीर्ण+क्त)–चन्दन–रजस्–पुञ्ज–प्रकर्ष (५.१) | From the abundance of sandalwood powder scattered by our tight embraces, |
| इयं | इदम् (१.१) | this |
| शय्या | शय्या (१.१) | bed |
| सम्प्रति | सम्प्रति | now, |
| कोमलाङ्गि | कोमलाङ्गी (८.१) | O tender-limbed one, |
| परुषा | परुषा (१.१) | is rough, |
| इति | इति | thus (saying), |
| आरोप्य | आरोप्य (आ√रुह्+णिच्+ल्यप्) | having placed |
| मां | अस्मद् (२.१) | me |
| वक्षसि | वक्षस् (७.१) | on his chest, |
| गाढौष्ठग्रहपूर्वम् | गाढ–ओष्ठ–ग्रह–पूर्वम् (२.१) | preceded by a firm kiss, |
| आकुलतया | आकुलता (३.१) | with eagerness, |
| पादाग्रसंदंशकेन | पाद–अग्र–संदंशक (३.१) | with the pincers of his toes, |
| आकृष्य | आकृष्य (आ√कृष्+ल्यप्) | having pulled |
| अम्बरम् | अम्बर (२.१) | my garment, |
| आत्मनः | आत्मन् (६.१) | his own, |
| यत् | यद् (१.१) | whatever |
| उचितं | उचित (१.१) | was appropriate, |
| धूर्तेन | धूर्त (३.१) | by the rogue, |
| तत् | तद् (१.१) | that |
| प्रस्तुतम् | प्रस्तुत (प्र√स्तु+क्त, १.१) | was begun. |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| गा | ढा | श्ले | ष | वि | शी | र्ण | च | न्द | न | र | जः | पु | ञ्ज | प्र | क | र्षा | दि | यं |
| श | य्या | स | म्प्र | ति | को | म | ला | ङ्गि | प | रु | षे | त्या | रो | प्य | मां | व | क्ष | सि |
| गा | ढौ | ष्ठ | ग्र | ह | पू | र्व | मा | कु | ल | त | या | पा | दा | ग्र | सं | दं | श | के |
| ना | कृ | ष्या | म्ब | र | मा | त्म | नो | य | दु | चि | तं | धू | र्ते | न | त | त्प्र | स्तु | तम् |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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