मुग्धे मुग्धतयैव नेतुमखिलः कालः किमारभ्यते
मानं धत्स्व धृतिं बधान ऋजुतां दूरे कुरु प्रेयसि ।
सख्यैवं प्रतिबोधिता प्रतिवचस्तामाह भीतानना
नीचैः शंस हृदि स्थितो ननु स मे प्राणेश्वरः श्रोष्यति ॥
मुग्धे मुग्धतयैव नेतुमखिलः कालः किमारभ्यते
मानं धत्स्व धृतिं बधान ऋजुतां दूरे कुरु प्रेयसि ।
सख्यैवं प्रतिबोधिता प्रतिवचस्तामाह भीतानना
नीचैः शंस हृदि स्थितो ननु स मे प्राणेश्वरः श्रोष्यति ॥
मानं धत्स्व धृतिं बधान ऋजुतां दूरे कुरु प्रेयसि ।
सख्यैवं प्रतिबोधिता प्रतिवचस्तामाह भीतानना
नीचैः शंस हृदि स्थितो ननु स मे प्राणेश्वरः श्रोष्यति ॥
अन्वयः
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(सखी आह) मुग्धे! प्रेयसि! मुग्धतया एव अखिलः कालः नेतुं किम् आरभ्यते? मानं धत्स्व, धृतिं बधान, ऋजुतां दूरे कुरु। एवं सख्या प्रतिबोधिता भीत-आनना ताम् प्रतिवचः आह, "नीचैः शंस। ननु मे सः प्राण-ईश्वरः हृदि स्थितः (अस्ति), श्रोष्यति।"
Summary
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A friend advises: "O simple one, why live in such innocence? Adopt some pride, be firm, put away your artlessness!" Thus advised, the girl, with a frightened face, replies, "Speak softly! My beloved resides in my heart; he will surely hear you."
पदच्छेदः
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| मुग्धे | मुग्धा (८.१) | O simple one! |
| मुग्धतयैव | मुग्धता (३.१)–एव | By simplicity alone |
| नेतुम् | नेतुम् (√नी+तुमुन्) | to spend |
| अखिलः | अखिल (१.१) | all |
| कालः | काल (१.१) | your time, |
| किम् | किम् | why |
| आरभ्यते | आरभ्यते (आ√रभ् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is it begun? |
| मानं | मान (२.१) | Pride |
| धत्स्व | धत्स्व (√धा कर्तरि लोट् (आत्मने.) म.पु. एक.) | adopt, |
| धृतिं | धृति (२.१) | firmness |
| बधान | बधान (√बन्ध् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | take, |
| ऋजुतां | ऋजुता (२.१) | straightforwardness |
| दूरे | दूर (७.१) | far away |
| कुरु | कुरु (√कृ कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | put, |
| प्रेयसि | प्रेयसी (८.१) | O dear one. |
| सख्या | सखी (३.१) | By her friend |
| एवं | एवम् | thus |
| प्रतिबोधिता | प्रतिबोधित (प्रति√बुध्+णिच्+क्त, १.१) | advised, |
| प्रतिवचः | प्रतिवचस् (२.१) | a reply |
| ताम् | तद् (२.१) | to her |
| आह | आह (√अह् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | said |
| भीतानना | भीत–आनन (१.१) | the one with a frightened face, |
| नीचैः | नीचैस् | 'Softly |
| शंस | शंस (√शंस कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | speak. |
| हृदि | हृद् (७.१) | In my heart |
| स्थितः | स्थित (√स्था+क्त, १.१) | is situated, |
| ननु | ननु | surely, |
| सः | तद् (१.१) | he, |
| मे | अस्मद् (६.१) | my |
| प्राणेश्वरः | प्राण–ईश्वर (१.१) | lord of life; |
| श्रोष्यति | श्रोष्यति (√श्रु कर्तरि लृट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | he will hear.' |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मु | ग्धे | मु | ग्ध | त | यै | व | ने | तु | म | खि | लः | का | लः | कि | मा | र | भ्य | ते |
| मा | नं | ध | त्स्व | धृ | तिं | ब | धा | न | ऋ | जु | तां | दू | रे | कु | रु | प्रे | य | सि |
| स | ख्यै | वं | प्र | ति | बो | धि | ता | प्र | ति | व | च | स्ता | मा | ह | भी | ता | न | ना |
| नी | चैः | शं | स | हृ | दि | स्थि | तो | न | नु | स | मे | प्रा | णे | श्व | रः | श्रो | ष्य | ति |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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