श्रुत्वा नामापि यस्य स्फुटघनपुलकं जायतेऽङ्गं समन्ता-
त्दृष्ट्वा यस्याननेन्दुं भवति वपुरिदं चन्द्रकान्तानुकारि ।
तस्मिन्नागत्य कण्ठग्रहणसरभसस्थायिनि प्राणनाथे
भग्ना मानस्य चिन्ता भवति मम पुनर्वज्रमय्याः कदा नु ॥
श्रुत्वा नामापि यस्य स्फुटघनपुलकं जायतेऽङ्गं समन्ता-
त्दृष्ट्वा यस्याननेन्दुं भवति वपुरिदं चन्द्रकान्तानुकारि ।
तस्मिन्नागत्य कण्ठग्रहणसरभसस्थायिनि प्राणनाथे
भग्ना मानस्य चिन्ता भवति मम पुनर्वज्रमय्याः कदा नु ॥
त्दृष्ट्वा यस्याननेन्दुं भवति वपुरिदं चन्द्रकान्तानुकारि ।
तस्मिन्नागत्य कण्ठग्रहणसरभसस्थायिनि प्राणनाथे
भग्ना मानस्य चिन्ता भवति मम पुनर्वज्रमय्याः कदा नु ॥
अन्वयः
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यस्य नाम अपि श्रुत्वा अङ्गं समन्तात् स्फुट-घन-पुलकम् जायते, यस्य आनन-इन्दुं दृष्ट्वा इदं वपुः चन्द्रकान्त-अनुकारि भवति, तस्मिन् प्राण-नाथे आगत्य कण्ठ-ग्रहण-सरभस-स्थायिनि (सति), वज्रमय्याः मम मानस्य चिन्ता पुनः कदा नु भग्ना भवति?
Summary
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"Just hearing his name makes my body bristle; seeing his moon-like face makes my body ooze like a moonstone. When that beloved comes and impetuously embraces me, when will the thought of my pride—I, who am as hard as adamant—finally be broken?"
पदच्छेदः
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| श्रुत्वा | श्रुत्वा (√श्रु+क्त्वा) | Having heard |
| नाम | नामन् (२.१) | the name |
| अपि | अपि | even |
| यस्य | यद् (६.१) | of whom, |
| स्फुटघनपुलकम् | स्फुट–घन–पुलक (१.१) | with distinct, dense horripilation |
| जायते | जायते (√जन् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | becomes |
| अङ्गम् | अङ्ग (१.१) | my body |
| समन्तात् | समन्तात् | all over; |
| दृष्ट्वा | दृष्ट्वा (√दृश्+क्त्वा) | having seen |
| यस्य | यद् (६.१) | whose |
| आननेन्दुम् | आनन–इन्दु (२.१) | moon-like face, |
| भवति | भवति (√भू कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | becomes |
| वपुः | वपुस् (१.१) | this body |
| इदम् | इदम् (१.१) | of mine |
| चन्द्रकान्तानुकारि | चन्द्रकान्त–अनुकारिन् (१.१) | like a moonstone (oozing); |
| तस्मिन् | तद् (७.१) | when that |
| आगत्य | आगत्य (आ√गम्+ल्यप्) | having come |
| कण्ठग्रहणसरभसस्थायिनि | कण्ठ–ग्रहण–सरभस–स्थायिन् (७.१) | and impetuously embracing my neck, |
| प्राणनाथे | प्राण–नाथ (७.१) | lord of my life, |
| भग्ना | भग्न (√भञ्ज्+क्त, १.१) | broken |
| मानस्य | मान (६.१) | of pride |
| चिन्ता | चिन्ता (१.१) | the thought |
| भवति | भवति (√भू कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | will be |
| मम | अस्मद् (६.१) | of me, |
| पुनः | पुनर् | again, |
| वज्रमय्याः | वज्रमयी (६.१) | who am as hard as adamant, |
| कदा | कदा | when |
| नु | नु | indeed? |
छन्दः
स्रग्धरा [२१: मरभनययय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ | २० | २१ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श्रु | त्वा | ना | मा | पि | य | स्य | स्फु | ट | घ | न | पु | ल | कं | जा | य | ते | ऽङ्गं | स | म | न्ता |
| त्दृ | ष्ट्वा | य | स्या | न | ने | न्दुं | भ | व | ति | व | पु | रि | दं | च | न्द्र | का | न्ता | नु | का | रि |
| त | स्मि | न्ना | ग | त्य | क | ण्ठ | ग्र | ह | ण | स | र | भ | स | स्था | यि | नि | प्रा | ण | ना | थे |
| भ | ग्ना | मा | न | स्य | चि | न्ता | भ | व | ति | म | म | पु | न | र्व | ज्र | म | य्याः | क | दा | नु |
| म | र | भ | न | य | य | य | ||||||||||||||
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