श्लिष्टः कण्ठे किमिति न मया मूढया प्राणनाथ-
श्चुम्बत्यस्मिन्वदनविधुतिः किं कृता किं न दृष्टः ।
नोक्तः कस्माद् इति नववधूचेष्टितं चिन्तयन्ती
पश्चात्तापं वहति तरुणी प्रेम्णि जाते रसज्ञा ॥
श्लिष्टः कण्ठे किमिति न मया मूढया प्राणनाथ-
श्चुम्बत्यस्मिन्वदनविधुतिः किं कृता किं न दृष्टः ।
नोक्तः कस्माद् इति नववधूचेष्टितं चिन्तयन्ती
पश्चात्तापं वहति तरुणी प्रेम्णि जाते रसज्ञा ॥
श्चुम्बत्यस्मिन्वदनविधुतिः किं कृता किं न दृष्टः ।
नोक्तः कस्माद् इति नववधूचेष्टितं चिन्तयन्ती
पश्चात्तापं वहति तरुणी प्रेम्णि जाते रसज्ञा ॥
अन्वयः
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प्रेम्णि जाते रसज्ञा तरुणी, "मूढया मया प्राण-नाथः कण्ठे किम् इति न श्लिष्टः? अस्मिन् चुम्बति (सति) वदन-विधुतिः किं कृता? किं न दृष्टः? कस्मात् न उक्तः?" इति नव-वधू-चेष्टितं चिन्तयन्ती पश्चात्तापम् वहति ।
Summary
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Once she understands the flavor of love, a young woman regrets her past coyness. She thinks, "Why didn't foolish me embrace him? Why did I turn my face when he kissed me? Why didn't I look at him or speak to him?" Reflecting on her behavior as a new bride, she is filled with remorse.
पदच्छेदः
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| श्लिष्टः | श्लिष्ट (√श्लिष्+क्त, १.१) | embraced |
| कण्ठे | कण्ठ (७.१) | on the neck |
| किमिति | किम्–इति | why |
| न | न | not |
| मया | अस्मद् (३.१) | by me, |
| मूढया | मूढा (३.१) | foolish one, |
| प्राणनाथः | प्राण–नाथ (१.१) | the lord of my life? |
| चुम्बति | चुम्बत् (√चुम्ब्+शतृ, ७.१) | When he was kissing, |
| अस्मिन् | इदम् (७.१) | this |
| वदनविधुतिः | वदन–विधुति (१.१) | shaking of the face, |
| किम् | किम् | why |
| कृता | कृत (√कृ+क्त, १.१) | was it done? |
| किम् | किम् | Why |
| न | न | not |
| दृष्टः | दृष्ट (√दृश्+क्त, १.१) | was he looked at? |
| न | न | Not |
| उक्तः | उक्त (√वच्+क्त, १.१) | spoken to, |
| कस्मात् | किम् (५.१) | why? |
| इति | इति | Thus |
| नववधूचेष्टितम् | नव–वधू–चेष्टित (२.१) | the behavior of a new bride, |
| चिन्तयन्ती | चिन्तयन्ती (√चिन्त्+शतृ, १.१) | thinking about, |
| पश्चात्तापम् | पश्चात्ताप (२.१) | regret |
| वहति | वहति (√वह् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | feels |
| तरुणी | तरुणी (१.१) | the young woman, |
| प्रेम्णि | प्रेमन् (७.१) | when in love |
| जाते | जात (√जन्+क्त, ७.१) | has arisen, |
| रसज्ञा | रस–ज्ञा (१.१) | who now knows its flavor. |
छन्दः
मन्दाक्रान्ता [१७: मभनततगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श्लि | ष्टः | क | ण्ठे | कि | मि | ति | न | म | या | मू | ढ | या | प्रा | ण | ना | थ |
| श्चु | म्ब | त्य | स्मि | न्व | द | न | वि | धु | तिः | किं | कृ | ता | किं | न | दृ | ष्टः |
| नो | क्तः | क | स्मा | दि | ति | न | व | व | धू | चे | ष्टि | तं | चि | न्त | य | न्ती |
| प | श्चा | त्ता | पं | व | ह | ति | त | रु | णी | प्रे | म्णि | जा | ते | र | स | ज्ञा |
| म | भ | न | त | त | ग | ग | ||||||||||
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