पीतस्तुषारकिरणो मधुनैव सार्धम्
अन्तः प्रविश्य चषके प्रतिबिम्बवर्ती ।
मानान्धकारमपि मानवतीजनस्य
नूनं बिभेद यद् असौ प्रससाद सद्यः ॥
पीतस्तुषारकिरणो मधुनैव सार्धम्
अन्तः प्रविश्य चषके प्रतिबिम्बवर्ती ।
मानान्धकारमपि मानवतीजनस्य
नूनं बिभेद यद् असौ प्रससाद सद्यः ॥
अन्तः प्रविश्य चषके प्रतिबिम्बवर्ती ।
मानान्धकारमपि मानवतीजनस्य
नूनं बिभेद यद् असौ प्रससाद सद्यः ॥
अन्वयः
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चषके अन्तः प्रविश्य प्रतिबिम्बवर्ती तुषारकिरणः मधुनैव सार्धम् पीतः (सन्), मानवतीजनस्य मानान्धकारम् अपि नूनं बिभेद, यत् असौ सद्यः प्रससाद ।
Summary
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The moon, entering the wine cup as a reflection, was drunk along with the wine. Surely, it also dispelled the darkness of anger in the proud woman, for she immediately became pleased.
पदच्छेदः
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| पीतः | पीत (√पा+क्त, १.१) | Being drunk |
| तुषारकिरणः | तुषारकिरण (१.१) | the moon |
| मधुना | मधु (३.१) | with the wine |
| एव | एव | along |
| सार्धम् | सार्धम् | with |
| अन्तः | अन्तर् | inside |
| प्रविश्य | प्रविश्य (प्र√विश्+ल्यप्) | having entered |
| चषके | चषक (७.१) | the cup |
| प्रतिबिम्बवर्ती | प्रतिबिम्बवर्तिन् (१.१) | as a reflection |
| मानान्धकारम् | मानान्धकार (२.१) | the darkness of anger |
| अपि | अपि | also |
| मानवतीजनस्य | मानवतीजन (६.१) | of the proud woman |
| नूनम् | नूनम् | Surely |
| बिभेद | बिभेद (√भिद् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | it dispelled |
| यत् | यद् | for |
| असौ | अदस् (१.१) | she |
| प्रससाद | प्रससाद (प्र√सद् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | became pleased |
| सद्यः | सद्यस् | immediately |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पी | त | स्तु | षा | र | कि | र | णो | म | धु | नै | व | सा | र्ध |
| म | न्तः | प्र | वि | श्य | च | ष | के | प्र | ति | बि | म्ब | व | र्ती |
| मा | ना | न्ध | का | र | म | पि | मा | न | व | ती | ज | न | स्य |
| नू | नं | बि | भे | द | य | द | सौ | प्र | स | सा | द | स | द्यः |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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