कठिनहृदये मुञ्च भ्रान्तिं व्यलीककथाश्रितां
पिशुनवचनैर्दुःखं नेतुं न युक्तमिमं जनम् ।
किमिदमथवा सत्यं मुग्धे त्वया हि विनिश्चितं
यद् अभिरुचितं तन्मे कृत्वा प्रिये सुखमास्यताम् ॥
कठिनहृदये मुञ्च भ्रान्तिं व्यलीककथाश्रितां
पिशुनवचनैर्दुःखं नेतुं न युक्तमिमं जनम् ।
किमिदमथवा सत्यं मुग्धे त्वया हि विनिश्चितं
यद् अभिरुचितं तन्मे कृत्वा प्रिये सुखमास्यताम् ॥
पिशुनवचनैर्दुःखं नेतुं न युक्तमिमं जनम् ।
किमिदमथवा सत्यं मुग्धे त्वया हि विनिश्चितं
यद् अभिरुचितं तन्मे कृत्वा प्रिये सुखमास्यताम् ॥
अन्वयः
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कठिनहृदये, व्यलीककथाश्रितां भ्रान्तिं मुञ्च । पिशुनवचनैः इमं जनं दुःखं नेतुं न युक्तम् । अथवा, मुग्धे, किम् इदम्? त्वया सत्यं विनिश्चितं हि यत्, तत् मे अभिरुचितम् । प्रिये, (तत्) कृत्वा सुखम् आस्यताम् ।
Summary
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"O hard-hearted one, abandon this delusion based on false tales. It is not right to cause me pain with the words of slanderers. Or, O simple one, what is this? If you have indeed decided it is true, then that is what pleases me. My dear, do as you wish and be happy."
पदच्छेदः
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| कठिनहृदये | कठिनहृदया (८.१) | O hard-hearted one |
| मुञ्च | मुञ्च (√मुच् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | abandon |
| भ्रान्तिम् | भ्रान्ति (२.१) | this delusion |
| व्यलीककथाश्रिताम् | व्यलीककथाश्रित (२.१) | based on false tales |
| पिशुनवचनैः | पिशुनवचन (३.३) | with the words of slanderers |
| दुःखम् | दुःख (२.१) | pain |
| नेतुम् | नेतुम् (√नी+तुमुन्) | to cause |
| न | न | not |
| युक्तम् | युक्त (√युज्+क्त, १.१) | it is right |
| इमम् | इदम् (२.१) | this |
| जनम् | जन (२.१) | person (me) |
| किम् | किम् (१.१) | what |
| इदम् | इदम् (१.१) | is this |
| अथवा | अथवा | Or |
| सत्यम् | सत्य (१.१) | true |
| मुग्धे | मुग्धा (८.१) | O simple one |
| त्वया | युष्मद् (३.१) | by you |
| हि | हि | indeed |
| विनिश्चितम् | विनिश्चित (वि+निस्√चि+क्त, १.१) | is decided |
| यत् | यद् (१.१) | that which |
| अभिरुचितम् | अभिरुचित (अभि√रुच्+क्त, १.१) | is pleasing |
| तत् | तद् (१.१) | that |
| मे | अस्मद् (४.१) | to me |
| कृत्वा | कृत्वा (√कृ+क्त्वा) | having done |
| प्रिये | प्रिया (८.१) | my dear |
| सुखम् | सुखम् | happily |
| आस्यताम् | आस्यताम् (√आस् भावकर्मणोः लोट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | be seated |
छन्दः
हरिणी [१७: नसमरसलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क | ठि | न | हृ | द | ये | मु | ञ्च | भ्रा | न्तिं | व्य | ली | क | क | था | श्रि | तां |
| पि | शु | न | व | च | नै | र्दुः | खं | ने | तुं | न | यु | क्त | मि | मं | ज | नम् |
| कि | मि | द | म | थ | वा | स | त्यं | मु | ग्धे | त्व | या | हि | वि | नि | श्चि | तं |
| य | द | भि | रु | चि | तं | त | न्मे | कृ | त्वा | प्रि | ये | सु | ख | मा | स्य | ताम् |
| न | स | म | र | स | ल | ग | ||||||||||
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