कान्ते सागसि शायिते प्रियसखीवेशं विधायागते
भ्रान्त्यालिङ्ग्य मया रहस्यमुदितं तत्सङ्गमाकाङ्क्षया ।
मुग्धे दुष्करमेतद् इत्यतितरामुक्त्वा सहासं बलाद्
आलिङ्ग्य छलितास्मि तेन कितवेनाद्य प्रदोषागमे ॥
कान्ते सागसि शायिते प्रियसखीवेशं विधायागते
भ्रान्त्यालिङ्ग्य मया रहस्यमुदितं तत्सङ्गमाकाङ्क्षया ।
मुग्धे दुष्करमेतद् इत्यतितरामुक्त्वा सहासं बलाद्
आलिङ्ग्य छलितास्मि तेन कितवेनाद्य प्रदोषागमे ॥
भ्रान्त्यालिङ्ग्य मया रहस्यमुदितं तत्सङ्गमाकाङ्क्षया ।
मुग्धे दुष्करमेतद् इत्यतितरामुक्त्वा सहासं बलाद्
आलिङ्ग्य छलितास्मि तेन कितवेनाद्य प्रदोषागमे ॥
अन्वयः
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अद्य प्रदोषागमे, सागसि कान्ते शायिते (सति), प्रियसखीवेशं विधाय आगते (तस्मिन्), मया भ्रान्त्या आलिङ्ग्य तत्सङ्गमाकाङ्क्षया रहस्यम् उदितम् । "मुग्धे, एतत् दुष्करम्" इति अतितराम् उक्त्वा, तेन कितवेन सहासं बलात् आलिङ्ग्य (अहम्) छलिता अस्मि ।
Summary
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"Tonight at dusk, when my guilty lover was lying down, he came disguised as my dear friend. I, mistaking him, embraced him and whispered a secret, longing for his company. Saying 'O simple one, this is difficult to achieve!' with a laugh, that rogue forcefully embraced me and I was deceived."
पदच्छेदः
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| कान्ते | कान्त (७.१) | the beloved |
| सागसि | सागस् (७.१) | guilty |
| शायिते | शायित (√शी+क्त, ७.१) | was lying down |
| प्रियसखीवेशम् | प्रियसखीवेश (२.१) | the guise of a dear friend |
| विधाय | विधाय (वि√धा+ल्यप्) | having assumed |
| आगते | आगत (आ√गम्+क्त, ७.१) | having come |
| भ्रान्त्या | भ्रान्ति (३.१) | by mistake |
| आलिङ्ग्य | आलिङ्ग्य (आ√लिङ्ग्+ल्यप्) | having embraced |
| मया | अस्मद् (३.१) | by me |
| रहस्यम् | रहस्य (१.१) | a secret |
| उदितम् | उदित (√वद्+क्त, १.१) | was spoken |
| तत् | तद् | his |
| सङ्गम | सङ्गम | union |
| आकाङ्क्षया | आकाङ्क्षा (३.१) | with the desire for |
| मुग्धे | मुग्धा (८.१) | O simple one |
| दुष्करम् | दुष्कर (१.१) | difficult to achieve |
| एतत् | एतद् (१.१) | this |
| इति | इति | thus |
| अतितराम् | अतितराम् | very much |
| उक्त्वा | उक्त्वा (√वच्+क्त्वा) | having said |
| सहासम् | सहासम् | with a laugh |
| बलात् | बलात् | forcefully |
| आलिङ्ग्य | आलिङ्ग्य (आ√लिङ्ग्+ल्यप्) | having embraced |
| छलिता | छलित (√छल्+क्त, १.१) | deceived |
| अस्मि | अस्मि (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | I am |
| तेन | तद् (३.१) | by him |
| कितवेन | कितव (३.१) | the rogue |
| अद्य | अद्य | today |
| प्रदोषागमे | प्रदोषागम (७.१) | at the arrival of dusk |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| का | न्ते | सा | ग | सि | शा | यि | ते | प्रि | य | स | खी | वे | शं | वि | धा | या | ग | ते |
| भ्रा | न्त्या | लि | ङ्ग्य | म | या | र | ह | स्य | मु | दि | तं | त | त्स | ङ्ग | मा | का | ङ्क्ष | या |
| मु | ग्धे | दु | ष्क | र | मे | त | दि | त्य | ति | त | रा | मु | क्त्वा | स | हा | सं | ब | ला |
| दा | लि | ङ्ग्य | छ | लि | ता | स्मि | ते | न | कि | त | वे | ना | द्य | प्र | दो | षा | ग | मे |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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