प्रातः प्रातरुपागतेन जनिता निर्निद्रता चक्षुषो-
र्मन्दायां मयि गौरवव्यपगमाद् उत्पादितं लाघवम् ।
किं मुग्धे न मया कृतं रमणधीर्मुक्ता त्वया गम्यतां
दुस्थं तिष्ठसि यच्च पथ्यमधुना कर्तास्मि तच्छ्रोष्यसि ॥
प्रातः प्रातरुपागतेन जनिता निर्निद्रता चक्षुषो-
र्मन्दायां मयि गौरवव्यपगमाद् उत्पादितं लाघवम् ।
किं मुग्धे न मया कृतं रमणधीर्मुक्ता त्वया गम्यतां
दुस्थं तिष्ठसि यच्च पथ्यमधुना कर्तास्मि तच्छ्रोष्यसि ॥
र्मन्दायां मयि गौरवव्यपगमाद् उत्पादितं लाघवम् ।
किं मुग्धे न मया कृतं रमणधीर्मुक्ता त्वया गम्यतां
दुस्थं तिष्ठसि यच्च पथ्यमधुना कर्तास्मि तच्छ्रोष्यसि ॥
अन्वयः
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मुग्धे, प्रातः प्रातः उपागतेन (त्वया) चक्षुषोः निर्निद्रता जनिता । मयि मन्दायाम् गौरव व्यपगमात् लाघवम् उत्पादितम् । मया किम् न कृतम्? त्वया रमण धीः मुक्ता । गम्यताम् । यत् दुःस्थम् तिष्ठसि, अधुना च यत् पथ्यम् (अस्ति), तत् कर्ता अस्मि, (तत्) श्रोष्यसि ।
Summary
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"O simple one, by arriving every morning, you have caused sleeplessness in my eyes. With me being unfortunate, you have produced disrespect by the loss of my dignity. What have I not done? You have given up the thought of me as a lover. Go. You stand uncomfortably, and now I will do what is beneficial, and you will hear of it."
पदच्छेदः
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| प्रातः | प्रातर् | In the morning |
| प्रातः | प्रातर् | every morning |
| उपागतेन | उपागत (उप+आ√गम्+क्त, ३.१) | by (you) who has arrived |
| जनिता | जनित (√जन्+क्त, १.१) | is caused |
| निर्निद्रता | निर्निद्रता (१.१) | sleeplessness |
| चक्षुषोः | चक्षुस् (६.२) | of the two eyes |
| मन्दायाम् | मन्द (७.१) | unfortunate |
| मयि | अस्मद् (७.१) | in me |
| गौरव | गौरव | respect |
| व्यपगमात् | व्यपगम (५.१) | from the loss of |
| उत्पादितम् | उत्पादित (उद्√पद्+णिच्+क्त, १.१) | is produced |
| लाघवम् | लाघव (१.१) | disrespect |
| किम् | किम् (१.१) | What |
| मुग्धे | मुग्धा (८.१) | O simple one |
| न | न | not |
| मया | अस्मद् (३.१) | by me |
| कृतम् | कृत (√कृ+क्त, १.१) | done |
| रमणधीः | रमणधी (१.१) | The thought of being a lover |
| मुक्ता | मुक्त (√मुच्+क्त, १.१) | is given up |
| त्वया | युष्मद् (३.१) | by you |
| गम्यताम् | गम्यताम् (√गम् भावकर्मणोः लोट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | You may go |
| दुस्थम् | दुःस्थ (२.१) | Uncomfortably |
| तिष्ठसि | तिष्ठसि (√स्था कर्तरि लट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you stand |
| यत् | यद् (१.१) | that which |
| च | च | and |
| पथ्यम् | पथ्य (१.१) | is beneficial |
| अधुना | अधुना | now |
| कर्ता | कर्तृ (१.१) | doer |
| अस्मि | अस्मि (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | I am |
| तत् | तद् (२.१) | that |
| श्रोष्यसि | श्रोष्यसि (√श्रु कर्तरि लृट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | you will hear |
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्रा | तः | प्रा | त | रु | पा | ग | ते | न | ज | नि | ता | नि | र्नि | द्र | ता | च | क्षु | षो |
| र्म | न्दा | यां | म | यि | गौ | र | व | व्य | प | ग | मा | दु | त्पा | दि | तं | ला | घ | वम् |
| किं | मु | ग्धे | न | म | या | कृ | तं | र | म | ण | धी | र्मु | क्ता | त्व | या | ग | म्य | तां |
| दु | स्थं | ति | ष्ठ | सि | य | च्च | प | थ्य | म | धु | ना | क | र्ता | स्मि | त | च्छ्रो | ष्य | सि |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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